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भगत सिंह का इतिहास: एक वीर क्रांतिकारी की अमर गाथा

Bhagat Singh

प्रस्तावना: वह चिंगारी जिसने दावानल का रूप लिया

दोस्तों, इतिहास के पन्नों मे बहुत से नाम दर्ज हैं लेकिन कुछ नाम ऐसे होते हैं जाओ सिर्फ अक्षरों में नहीं बल्कि हमारी रगों मे खून बनकर दौड़ते हैं | भगत सिंह एक ऐसा ही नाम है |क्या आपने कभी सोचा है कि कैसे एक नौजवान, जिसके उम्र खेलने-कूदने और करियर बनाने की होती है, वह हँसते-हँसते फांसी के फंदे को चूम लेता है ? यह कोई आम बात नहीं है| उनका जीवन एक जलती हुई मशाल की तरह था जिसने लाखों युवाओं के दिलों मे आज़ादी की आग लगा दी |

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हम अक्सर उन्हे सिर्फ एक ‘बहादुर लड़के’ के रूप मे याद करते हैं जिसने बम फेंका था | लेकिन सच्चाई यह है कि भगत सिंह एक गहरे विचारक, शानदार लेखक और एक विजनरी नेता थे | आज हम भगत सिंह के उस सफर पर चलेंगे जहँ हम उनके जन्म से लेकर उनकी शहादत और उनके विचारों की गहराई को समझेंगे| तो चलिए, समय के पहिए, को थोड़ा पीछे घुमाते हैं|

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि 

जन्म और गाँव का माहौल 

भारत सिंह का जन्म 28 सितंबर 1907 को पंजाब के लायलपुर जिले के बंगा गाँव (जो अब पाकिस्तान मे है ) मे हुआ था | कहते हैं न, ‘पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं’, भगत सिंह के साथ भी कुछ ऐसा ही था | उनका जन्म एक ऐसे सिख परिवार मे हुआ था जिनकी नस-नस मे देशभक्ति दौड़ती थी|

देशभक्ति का पारिवारिक प्रभाव 

उनके पिता सरदार किशन सिंह और चाचा अजीत सिंह खुद जाने-माने स्वतंत्रता सेनानी थे | सोचिए उस घर का माहौल कैसा होगा जहाँ रोज सुबह की चाय के साथ आज़ादी की चर्चाएं होती हो! बचपन मे जब अन्य बच्चे खिलौने से खेलते थे, तब बालक भगत सिंह खेतों मे बंदूकें बोने की बात किया करते थे ताकि उनसे और बंदुके उगें औ अंग्रेजों को भगाया जा सके | यह महज एक बालसुलभ कल्पना नहीं थी ; यह उनके अवचेतन मन मे बैठ रही क्रांति का बीज था|

जलियावाला बाग हत्याकांड: बचपन का गहरा घाव 

साल 1919 | 13 अप्रैल का वह मनहूस दिन जिसने पूरे भारत की आत्मा को झकझोर कर रख दिया | जालियावाला बाग मे निहत्थे भारतीयों पर जनरल डायर ने अंधाधुंध गोलियां चलवा दीं | उस वक्त भगत सिंह की उम्र महज़ 12 साल थी| जरा कल्पना कीजिए एक 12 साल के बच्चे के मन की स्थिति की|

घटना के अगले ही दिन वह स्कूल जाने के वजाय सीधा जलियावाला बाग पहुँच गए | वहां की खून से सनी मिट्टी को उन्होंने एक शीशी मे भर लिया | वह मिट्टी उनके लिए सिर्फ मिट्टी नहीं थी ; वह एक संकल्प था | वह रोज उस शीशी की पूजा करते थे | इस एक घटना ने उस मासूम बच्चे के अंदर के क्रांतिकारी को पूरी तरह से जगा दिया था | अब उन्हे समझ आ गया था कि हाथ जोड़कर आज़ादी नहीं मिलने वाली|

शिक्षा और वैचारिक विकास 

नेशनल कॉलेज, लाहौर के दिन 

जैसे-जैसे वे बड़े हुए, उनका दाखिला लाला लाजपत राय द्वारा स्थापित ‘नेशनल कॉलेज’, लाहौर मे हुआ | यह कॉलेज कोई साधारण कॉलेज नहीं था; यह क्रांतिकारियों की नर्सरी था| यही उनकी मुलाकात सुखदेव थापर, भगवती चरण बोहरा और यशपाल जैसे युवा क्रांतिकारियों से हुई| 

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किताबों से दोस्ती और मार्क्सवाद का प्रभाव 

भगत सिंह को पढ़ने का गजब का शौक था | वह सिर्फ एक्शन-ऑरिएन्टेड युवा नहीं थे, बल्कि एक ‘रीडिंग मशीन थे | उन्होंने यूरोपीय क्रांतिकारी आंदोलन, मार्क्सवाद और समाजवाद का गहराई से अध्ययन किया | लेनिन और कार्ल मार्क्स की विचारधारा ने उन्हे बहुत प्रभावित किया | उनका मानना था की सिर्फ अंग्रेजों को बाहर निकालना काफी नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था को बदलना जरूरी है जो गरीबों और मजदूरों का शोषण करती है|

क्रांतिकारी जीवन की शुरुआत और संगठन

नौजवान भारत सभा और  एचएसआरए (HSRA) का गठन

किताबी ज्ञान को धरातल पर उतारने का समय आ गया था | 1926 में भगत सिंह ने युवाओं में राष्ट्रवाद की भावना जगाने के लिए ‘नौजवान भारत सभा’ की स्थापना की | इसके बाद, राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकउल्ला खान जैसे नेताओं की गिरफ़्तारी के बाद कमजोर पड़ चुके ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HRA) को उन्होंने नया जीवन दिया|

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चंद्रशेखर आज़ाद के साथ मिलकर उन्होंने इसका नाम बदलकर‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) रख दिया | ‘सोशलिस्ट’(समाजवादी) शब्द का जुड़ना ही यह दर्शाता है कि भगत सिंह का विज़न सिर्फ राजनीतिक आज़ादी नहीं,बल्कि आर्थिक और सामाजिक आज़ादी भी था|

साइमन कमीशन का विरोध और लाला लाजपत राय की शहादत 

1928 में जब साइमन कमीशन भारत आया, तो पूरे देश मे इसका पुरजोर विरोध हुआ| इस कमीशन में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था! लाहौर मे इस शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय कर रहे थे|

अंग्रेज पुलिस अधीक्षक जेम्स ए. स्कॉट ने इस शांतिपूर्ण भीड़ पर लाठीचार्ज का क्रूर आदेश दे दिया | लाला जी पर बेरहमी से लाठिया बरसाई गई, जिसके कारण कुछ दिनों बाद 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया | इस घटना ने पूरे देश, और विशेष रूप से युवा क्रांतिकारियों के खून को खौला दिया | लाला जी की मौत का बदला लेना अब HSRA का मुख्य लक्ष्य बन गया|

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सांडर्स वध: पतिशोध की दहकती ज्वाला 

भगत सिंह, शिवराम राजगुरु, सुखदेव और चंद्रशेखर आज़ाद ने स्कॉट को मारने की योजना बनाई| लेकिन 17 दिसम्बर 1928 को एक बड़ी भूल हो गई | उन्होंने स्कॉट की जगह जॉन पी सांडर्स भी लाठीचार्ज मे शामिल था, इसलिए क्रांतिकारियों ने इसे भी न्याय माना |

इस घटना के बाद भगत सिंह रातों-रात पूरे भारत मे एक हीरो बन गए | दीवारों पर पर्चे चिपकाए गए जिसमे लिखा था की “एक राष्ट्र के अपमान का बदला ले लिया गया है|” इसके बाद पुलिस से बचने के लिए भगत सिंह ने अपने बाल कटवा लिए और वेश बदलकर कलकत्ता निकल गए | यह उनका एक बहुत बड़ा बलिदान था क्योंकि एक सिख के लिए उसके बाल बहुत पवित्र होते हैं |

केंद्रीय असेंबली में बम विस्फोट: “बहरों को सुनाने के लिए”

बटुकेश्वर दत्त के साथ उठाया गया ऐतिहासिक कदम

ब्रिटिश सरकार भारतीय जनता को दबाने के लिए ‘पब्लिक सेफ़्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिस्प्यूट ऐक्ट’ जैसे काले कानून पास करने वाली थी | भगत सिंह और उनकी पार्टी ने तय किया कि इसका विरोध एक अलग अंदाज मे किया जाएगा|

8 अप्रैल 1929 को, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने दिल्ली की केन्द्रीय असेंबली के दर्शक दीर्घा से दो बम फेंके। बम खाली जगह पर फेंके गए थे, जिनका मकसद किसी की जान लेना नहीं था | इसके तुरंत बाद उन्होंने वहां पर्चे फेंके जिन पर लिखा था:

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बहरों को सुनाने के लिए धमाके की जरूरत होती हैं|

सबसे बड़ी बात यह थि की बम फेंकने के बाद वे वहां से भागे नहीं | वे वहीं खड़े रहे और “इंकलाब ज़िन्दाबाद” तथा “सम्राज्यवाद मुर्दाबाद” के नारे लगाते हुए स्वेच्छा से अपनी गिरफ़्तारी दी | उनका मकसद कोर्ट को एक मंच के रूप में इस्तेमाल करना था ताकि वे अपनी आवाज़ पूरे देश तक पहुँचा सकें|

जेल का जीवन : एक नई लड़ाई का मैदान 

एतिहासिक भूख हड़ताल और क्रांतिकारी लेख 

जेल की सलाखें भी इस शेर को शांत नहीं कर सकीं | जब भगत सिंह ने देखा की जेल में भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ जानवरों जैसा सलूक किया जा रहा गोरे कैदियों को सारी सुविधाएं मिल रही हैं, तो उन्होंने इसके खिलाफ आवाज़ उठाई |

उन्होंने एक ऐतिहासिक भूख हड़ताल की जो 116 दिनों तक चली! यह कल्पना से भी परे है | इस दौरान उन्हे ज़बरदस्ती दूध पिलाने की कोशिश की गई, उन पर कोड़े बरसाए गए, लेकिन वे नहीं  टूटे| अंततः ब्रिटिश सरकार को उनकी मांगे माननी पड़ी| जेल के अंदर से ही उन्होंने अपनी डायरी लिखी औ कई शानदार लेख लिखे, जो बाहर अखबारों मे छपते थे और युवाओ को प्रेरित करते थे|

लाहौर षड्यन्त्र केस और फांसी की सजा का ऐलान

असेंबली बम के मामले मे उन्हे आजीवन कारावास की सजा हुई| लेकिन जल्द ही ब्रिटिश पुलिस ने सांडर्स हत्या मामले (जिसे लाहौर षड्यन्त्र केस कहा गया ) की परतें भी खोल दीं| इस केस मे भगत सिंह,सुखदेव औरराजगुरु को मुख्य आरोपी बनाया गया|

अदालत की कार्यवाही महज़ एक दिखावा थी| 17 अक्टूबर 1930 को एक विशेष ट्रिब्यूनल ने अपना फैसला सुनाया और इन तीनों वीर सपूतों को फांसी की सज़ा मुकर्रर कर दी गई| सज़ा सुनकर तीनों के चेहरे पर शिकन तक नहीं थी बल्कि वे तो मुस्कुरा रहे थे, क्योंकि वे जानते थे कि उनकी शहादत ब्रिटिश सम्राज्य के ताबूत मे आखिरी कील साबित होगी|

23 मार्च 1931: शहादत का वह कला दिन 

फांसी के मुकर्रर तारीख 24 मार्च थी| लेकिन जनता के आक्रोश और सभावित विद्रोह से डरकर, कायर ब्रिटिश सरकार ने नियमों को तोड़ते हुए एक दिन पहले, 23 मार्च 1931 की शाम को ही उन्हे फांसी देने का फ़ैसला किया|

कहा जाता है की जब जेलर उन्हे लेने आया, तब भगत सिंह लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे| उन्होंने जेलर से कहा,”रुकिए, एक क्रांतिकारी दूसरे क्रान्तरिकारी से मिल रहा है|” इसके बाद तीनों दोस्त एक-दूसरे एक-दूसरे के गले मिले और ‘मेरे रंग दे बसंती चोला’ गाते हुए, इंकलाब ज़िन्दाबाद के नारे के साथ हस्ते-हस्ते फांसी के फंदे पर झूल गए| उनकी शहादत की खबर ने पूरे देश को रुला दिया, लेकिन साथ ही आज़ादी की लड़ाई कोएक ऐसा तूफान बना दिया जिसे रोकना अब अंग्रेजों के बस की बात नहीं थी|

भगत सिंह की विचारधारा: धर्म और समाज पर विचार 

भगत सिंह सिर्फ एक भावुक देशभक्त नहीं थे: वे एक प्रखर बुद्धिजीवी थे| जेल मे लिखा गया उनका निबंध ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ ‘(Why I am an Atheist) उनके तार्किक और वैज्ञानिक सोच का प्रमाण है | वे अंधविश्वास, सांप्रदायिकता और जातिवाद के घोर विरोधी थे|

उनका मानना था कि जब तक समाज मे उंच-नीच औ आर्थिक असमानता रहेगी,तब तक ‘आज़ादी’ का कोई वास्तविक अर्थ नहीं है| वे एक ऐसे भारत का सपना देखते थे जहाँ सत्ता कुछ अमीर लोगों के हाथ में न होकर मजदूर औ किसानों के हाथ मे हो|

निष्कर्ष: आज के युवाओ के लिए भगत सिंह की प्रासंगिकता

भगत सिंह का आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1930 के दशक में था| आज हमें शायद गोरे अंग्रेजों से आज़ादी नहीं चाहिए, लेकिन गरीबी, भ्रष्टाचार,सांप्रदायिकता और बेरोजगारी जैसे ‘काले अंग्रेजों’ से आज़ादी आज भी बाकी है|

भगत सिंह हमें सिखाते हैं की सवाल करना जरूरी है| वे हमें सिखाते हैं की अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाना हर नागरिक का धर्म है| जब तक युवाओं में देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा रहेगा, भगत सिंह एक विचार के रूप में हमेशा हमारे बीच ज़िंदा रहेंगे| ऊक नारा ‘इंकलाब ज़िन्दाबाद’ सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि भारत की धड़कन है !

उनका उद्देश्य किसी की जान लेना नहीं था, बल्कि जन-विरोधी कानूनों (पब्लिक सेफ़्टी बिल ) का विरोध करना और बहरी ब्रिटिश सरकार तक अपनी आवाज़ पहुँचाना था | इसलिए उन्होंने खाली जगह पर कम शक्ति वाले बम फेंके थे |

जेल मे कुछ लोगों उन पर आरोप लगाया की मौत के डर से शायद वे ईश्वर को याद करे या अहंकार में भगवान को नहीं मानते | इसके जवाब मे उन्होंने तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह निबंध लिखा था की वे ईश्वर मे विश्वास क्यों नहीं करते|

यह नारा मूल रूप से मौलाना हसरत मोहानी द्वारा 1921 मे गढ़ा गया था, लेकिन भगत सिंह और उनके साथियों ने इसे लोकप्रिय बनाया| इसका अर्थ “क्रांति अमर रहे” (Long Live the Revolution )

भगत सिंह कार्ल मार्क्स, व्लादिमीर लेनिन, मिखाइल बाकुनीन और लियो टॉल्स्टॉय जैसे समाजवादी और क्रांतिकारी विचारकों से बहुत अधिक प्रभावित थे।

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