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साइमन कमीशन पूरा इतिहास 

Simon Commission

साइमन कमीशन: इतिहास,कारण भयंकर विरोध और इसका गहरा प्रभाव 

क्या आपने कभी सोचा है यदि आपके घर के सारे महत्वपूर्ण फैसले कोई ऐसा बाहरी व्यक्ति लेने लगे जिसने आपका घर कभी देखा ही न हो, तो आपको कैसा महसूस होगा?

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गुस्सा आएगा न ? बिल्कुल ऐसा ही कुछ 1927 मे भारत के साथ हुआ था | जब ब्रिटिश सरकार ने भारत के राजनीतिक भविष्य का फैसला करने के लिए एक ऐसा कमीशन भेजा, जिसमे के भी भारतीय नहीं था | इसे ही हम इतिहास मे साइमन कमीशन के नाम से जानते है | आज हम बिल्कुल सरल भाषा मे और गहराई से समझेंगे की यह कमीशन क्या था, क्यों आया और क्यों भारतीयों ने इसे देखते ही काले झंडे दिखा दिए|

साइमन कमीशन क्या था ?

साइमन कमीशन (Simon Commission), जिसे आधिकारिक तौर पर ‘भारतीय सांविधिक आयोग’(Indian Statutory Commission) कहा जाता था, ब्रिटिश संसद के 7 सदस्यों का एक समूह था | इसे 1927 में भारत भेजा गया था ताकि यह अध्ययन किया जा सके कि भारत में संवैधानिक सुधारों (Constitutional Reforms) की दिशा मे क्या कदम उठाए जाने चाहिए | आसान शब्दों में कहें तो, यह कमीशन यह तय करने आया था कि भारतीयों को सरकार चलाने के कितने अधिकार दिए जा सकते हैं |

गठन की पृष्ठभूमि 

इसकी जड़े 1919 के भारत सरकार अधिनियम (Goverment of India Act 1919) मे छिपी थीं | उस अधिनियम मे एक शर्त रखी गई थी कि 10 साल बाद (यानि 1929 में )एक कमीशन भारत आएगा जो यह देखेगा कि 1919 के कानून ने कैसा काम किया है | लेकिन ब्रिटेन मे कंजर्वेटिव पार्टी की सरकार थी और उन्हे डर था कि अगले चुनाव में लेबर  पार्टी जीत सकती है | इसलिए,हड़बड़ी मे उन्होंने तय समय से दो साल पहले ही नवंबर 1927 मे इस कमीशन का गठन कर दिया |

कमीशन के सदस्य 

इस कमीशन के अध्यक्ष जॉन साइमन (Sir John Simon) थे, जिनके नाम पर इसका नाम ‘साइमन कमीशन’ पड़ा | सबसे चौकाने वाली बात यह थी कि इस कमीशन के सभी सात सदस्य अंग्रेज थे | इस बात को समझने के लिए ज़रा इस चार्ट पर नजर डालिए|

साइमन कमीशन की संरचना (सदस्यता)

यही वह मुख्य कारण था जिसने पूरे भारत में आग लगा दी। भारत का भविष्य तय करने वाले समूह में भारतीय शून्य थे।

Simon Commission

साइमन कमीशन भारत क्यों आया ?

अब सवाल उठता है कि ब्रिटिश सरकार को अचानक भारत की इतनी चिंता क्यों होने लगी? इसके पीछे कुछ गहरे राजनीतिक कारण थे|

1919 का भारत सरकार अधिनियम की समीक्षा 

जैसा की मैंने पहले बताया, 1919 के अधिनियम (मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार) की जांच करना इसका मुख्य उद्देश्य था | अंग्रेजों को यह देखना था कि क्या भारतीय इस लायक हो गए है की उन्हे कुछ और जिम्मेदारियां दी जाएं, या फिर उनसे मौजूदा अधिकार भी छिन लिए जाएं ?

द्वैध शासन (Dyarchy) की विफलता 

1919 के कानून ने प्रांतों (राज्यों ) मे ‘द्वैध शासन’ लागू किया था | इसका मतलब था की सरकार के कुछ विभाग भारतीय मंत्रियों को दिए गए और कुछ (जैसे पुलिस,वित ) अंग्रेजों ने अपने पास रखे | यह सिस्टम बुरी तरह फेल हो चुका था | भारतीय नेताओ का कहना था कि बिना पैसे (वित्त ) के वे जनता की भलाई के काम कैसे कर सकते हैं? साइमन कमीशन को इसी फेल हो चुके सिस्टम की जांच करनी थी |

भारत में भयंकर विरोध का कारण: आग क्यों भड़की ?

जरा सोचिए, एक मरीज के इलाज का फैसला करने के लिए डॉक्टरों की टीम बैठे, लेकिन उस टीम में मरीज का अपना कोई न हो और न ही कोई उसकी बीमारी को समझता हो भारतीय को बिल्कुल ऐसा ही लगा |

“श्वेत कमीशन” का दाग 

 चूँकि सातों सदस्य (गोरे )थे , इसलिए भारतीयों ने इसे “श्वेत कमीशन”(All-White Commission) का नाम दिया | भारत को यह बात हज़म नहीं हुई कि उनके देश का संविधान गोरे लोग बनाएंगे जिन्हे भारत की संस्कृति, समस्याओं और भावनाओं की कोई समझ नहीं हैं|

भारतीयों का घोर अपमान 

उस समय भारत सचिव(Secretary of State) लॉर्ड वर्कनहेड का मानना था कि भारतीय लोग आपस मे इतने बटे हुए हैं कि वे कभी भी मिलकर एक संविधान नहीं बना सकते| एक भी भारतीय को कमीशन मे शामिल न करना, सीधे-सीधे 30 करोड़ भारतीयों की बुद्धिमत्ता और क्षमता पर तमाचा था | यह हमारे आत्मसम्मान की बात थी, और भारतीय अब और अपमान सहने के मूड मे नहीं थे|

विरोध का स्वरूप और एतिहासिक आंदोलन 

3 फरवरी 1928, यह दिन था जब साइमन कमीशन बंबई (अब मुंबई ) पहुंचा| जिस दिन उन्होंने भारतीय ज़मीन पर कदम रखा, पूरा देश मानो एक आवाज मे उनके खिलाफ उठ खड़ा हुआ |

“साइमन गो बैक” के नारे 

बंबई मे उनका स्वागत साइमन वापस जाओ”(Simon Go Back) के गगनभेदी नारों से हुआ| जहाँ-जहाँ कमीशन गया-चाहे वह दिल्ली हो, कलकत्ता, लखनऊ या लाहौर- हर जगह उन्हे काले झंडे और भारी भीड़ के गुस्से का सामना करना पड़ा |

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लाला लाजपत राय का महान बलिदान 

20 अक्टूबर 1928 को जब कमीशन लाहौर पहुँचा, तो विरोध का नेतृत्व पंजाब केसरी लाला लाजपत राय कर रहे थे | उन्होंने शांतिपूर्ण जुलूस निकाला | लेकिन ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट ने बेरहमी से लाठीचार्ज का आदेश दे दिया| लाला जी के सिर और छाती पर लठियों के कई प्रहार हुए | गंभीर रूप से घायल लाला जी ने दहाड़ते हुए कहा था;

मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत की कील साबित होगी !

कुछ दिनों बाद 17 नवंबर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई | इस घटना ने पूरे देश, विशेषकर युवाओं (जैसे भगत सिंह) के खून मे उबाल ला दिया |

देशव्यापी हड़ताल और काले झंडे 

छात्रों, मजदूरों, महिलाओं और आम नागरिकों ने स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों का वाहिष्कार किया| यह एक ऐसा समय था जब पूरा भारत अपने मतभेदों को भुलाकर एक छतरी के नीचे आ गया था | पुलिस ने गोलियां चलाई, बरसाई, लेकिन विरोध थमा नहीं|

घटनाक्रम: साइमन कमीशन और भारतीय राजनीति

इस टाइमलाइन के ज़रिए समझें कि कैसे एक के बाद एक घटनाएं घटीं।

राजनीतिक दलों की भूमिका (मुस्लिम लीग और काँग्रेस )

भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस ने मद्रास अधिवेशन (1927) मे ही स्पष्ट कर दिया था की वे साइमन कमीशन का ‘हर चरण और हर रूप’ में वाहिष्कार करेंगे | मुस्लिम लीग में इस दौरान फुट पड़ गई | मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाले गुट ने कॉंग्रेस का साथ दिया और कमीशन का वाहिष्कार किया, जबकि मोहम्मद शफ़ी के नेतृत्व वाले एक छोटे गुट ने सरकार का साथ देने का फैसला किया| हिन्दू महासभा और लिबरल फेडरेशन ने भी इस इस विरोध मे पूरी तरह कॉंग्रेस का साथ दिया |

साइमन कमीशन की प्रमुख सिफारिशें 

भारी विरोध के बावजूद, कमीशन ने अपनी जांच पूरी की और मई 1930 मे अपनी दो-खंडों की रिपोर्ट प्रकाशित की | यह रिपोर्ट कई मायनों मे महत्वपूर्ण थी, हालांकि भारतीयों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया था | इसकी मुख्य बातें क्या थीं?

प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy)

कमीशन ने मानो की प्रांतों मे ‘द्वैध शासन’ काम नहीं कर रहा है | इसलिए उसने सिफारिश की कि प्रांतों को स्वायत्तता(autonomy) दी जाए और सरकार की जिम्मेदारी भारतीय मंत्रियों को सौपी जाए, जो विधानमंडल के प्रति जवाबदेह हों| लेकिन, उन्होंने गोवर्नरों को विशेष शक्तियां देने की भी बात कही, जो किसी भी समय सरकार को बर्खास्त कर सकते थे |

केंद्र मे मजबूत और गैर-जिम्मेदार सरकार 

प्रांतों मे तो थोड़ी छूट दी गई, लेकिन केंद्र सरकार के स्तर पर कमीशन ने किसी भी बड़े बदलाव से इनकार कर दिया | केंद्र मे अभी भी ब्रिटिश वायसराय का पूरा नियंत्रण रखने की सिफारिश की गई थी| साथ ही, उन्होंने भारत के लिए एक संघीय ढांचे (Federal Structure) का सुझाव दिया, जिसमे ब्रिटिश भारत और देसी रियासतें शामिल हों|

साइमन कमीशन का प्रभाव और ऐतिहासिक परिणाम 

क्या साइमन कमीशन सिर्फ एक नाकाम कोशिश थी? नहीं! इस कमीशन ने अनजाने में ही सही,भारत की राजनीति को हमेशा के लिए बदल दिया|

गोलमेज सम्मेलन (Round Table Conferences) की राह 

Simon Commission

साइमन रिपोर्ट पब्लिश होने के बाद, ब्रिटिश सरकार को समझ आ गया की वे भारतीयों की सहमति के बिना आगे नहीं बढ़ सकते| इसलिए, कमीशन की रिपोर्ट पर चर्चा करने के लिए लंदन मे तीन गोलमेज सम्मेलन आयोजित किए गए (1930,1931,1932) | हालांकि ये सम्मेलन बहुत सफल नहीं रहे लेकिन इसने ब्रिटिश सरकार को पहली बार भारतीयों को बराबर के दर्जे पर बात करने के लिए मजबूर किया |

1935 का भारत सरकार अधिनियम 

साइमन कमीशन की सिफारिशों ही वह कच्चा माल थी, जिससे अंततः 1935 भारत सरकार अधिनियम तैयार हुआ | यही अधिनियम आगे चलकर स्वतंत्र भारत के संविधान (1950) का सबसे बड़ा आधार बना | भारत के संविधान के बहुत से प्रावधान 1935 के अधिनियम से सीधे लिए गए हैं|

निष्कर्ष 

अंत मे हम यह कह सकते हैं की साइमन कमीशन ब्रिटिश सरकार की एक बहुत बड़ी भूल थी, लेकिन यह भारत के लिए एक ‘ब्लेसिंग इन  डिस्गाइज’ (छुपा हुआ वरदान ) साबित हुआ | इस कमीशन ने भारत के सोए हुए राष्ट्रवाद को जगा दिया| बंटे हुए भारतीय नेता एक हो गए, और यहीं से भारत ने “पूर्ण स्वराज”(Complete Independence ) की मांग को अपना अंतिम लक्ष्य बना लिया | साइमन कमीशन वह चिंगारी थी जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक ऐसी दावानल मे बदल दिया जिसे बुझाना फिर ब्रिटिश सम्राज्य के बस की बात नहीं रही |

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

विरोध का सबसे बड़ा कारण यह था कि इस 7-सदस्यीय कमीशन में एक भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया था। सभी सदस्य ब्रिटिश (गोरे) थे। भारतीयों ने इसे अपना अपमान माना कि उनके देश का संविधान बनाने वाले समूह में उनका कोई प्रतिनिधित्व नहीं है।

“साइमन गो बैक” (Simon Go Back) का प्रसिद्ध नारा ‘युसूफ मेहरअली’ (Yusuf Meherally) द्वारा गढ़ा गया था, जो एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी और समाजवादी नेता थे। पूरे देश के विरोध प्रदर्शनों में इसी नारे का गगनभेदी उद्घोष किया गया।

लाहौर में साइमन कमीशन का शांतिपूर्ण विरोध करते समय पुलिस द्वारा किए गए क्रूर लाठीचार्ज में पंजाब केसरी लाला लाजपत राय बुरी तरह घायल हो गए थे। इसी के परिणामस्वरूप 17 नवंबर 1928 को उनका निधन हो गया था।

कमीशन की रिपोर्ट मई 1930 में प्रकाशित हुई। हालांकि इसे सीधे तौर पर लागू नहीं किया गया, लेकिन इसकी सिफारिशों ने लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलनों का आधार तय किया। बाद में, इन्ही सिफारिशों के आधार पर ‘भारत सरकार अधिनियम 1935’ पारित किया गया।






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