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भारत छोड़ो आंदोलन का पूर्ण विश्लेषण

Quit India Movement

 भारत छोड़ो आंदोलन: 1942 की अगस्त क्रांति का महासंग्राम

प्रस्तावना: स्वतंत्रता संग्राम का अंतिम और सबसे बड़ा प्रहार

नमस्ते दोस्तों! क्या आपने कभी सोचा है कि जब पूरा विश्व दूसरे विश्व युद्ध की आग में जल रहा था, तब हमारे देश भारत के क्या खिचड़ी पक रही थी? यह कोई आम समय नहीं था | यह वह समय था जब भारतीयों के धैर्य का बांध टूट चुका था | दशकों से चली आ रही अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति, झूठे वादे , और शोषण ने देश को एक प्रेशर कुकर में बदल दिया था | बस जरूरत थी तो एक सिटी बजने की, और वो सिटी थी ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ (quit India movement) |

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1942 का भारत: एक सुलगता हुआ ज्वालामुखी 

कल्पना कीजिए के ऐसे माहौल की जहां हर तरफ अनिश्चितता है| एक तरफ जापानी सेनाएं बर्मा (आज का म्यांमार) तक पहुंच चुकी थी और भारत मे दरवाजे पर दस्तक दे रही थीं | दूसरी तरफ, अंग्रेज सत्ता बचाने के लिए भारतीयों क खून चूस रहे थे | यह के सुलगता हुआ ज्वालामुखी था, जिसके फटने का समय आ गया था |

द्वितीय विश्व युद्ध और भारत की मजबूरी

1939 में जब द्वितीय युद्ध शुरू हुआ, तो ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों से पूछे बिना ही भारत को इस युद्ध में झोंक दिया | आप खुद सोचिए, क्या यह सही था? हमारे संसाधन, हमारे जवान, हमारी जमीन इस्तेमाल हो रही थी एक ऐसे युद्ध के लिए जिससे हमारा कोई लेना देना नहीं था | इसके बदले मे आसमान छूती महंगाई, राशन की कमी और भुखमरी भारतीयों के हिस्से मे आई |

क्रिप्स मिशन की विफलता: “डूबते बैंक का चेक”

जब भारत में गुस्सा बढ़ने लगा और जापानी आक्रमण का खतरा मंडराने लगा, तो अंग्रेजों ने 1942 में सर स्टैफोर्ड क्रिप्स को भारत भेजा| इसे ‘क्रिप्स मिशन’ (Cripps Mission) कहा गया |

उन्होंने क्या पेश किया? वही पुराना झुनझुना- ‘युद्ध के बाद हम आपको डोमिनीयन स्टेट्स (अधिराज्य का दर्जा ) देंगे | महात्मा गांधी जी ने इस प्रस्ताव को सिरे से खारिज कर दिया और इसे “एक डूबते हुआ बैंक का पोस्ट-डेटेड चेक” post-dated cheque on a crashing bank) करार दिया। अब हमें आधा-अधूरा स्वराज नहीं, पूर्ण स्वतंत्रता चाहिए थी।

Quit India Movement

आंदोलन का शंखनाद: 8 अगस्त 1942 की वो एतिहासिक रात

 क्रिप्स  मिशन की विफलता के बाद गांधी जी को समझ आ गया था कि अब बातचीत का समय खत्म हो चुका है | अब सीधा प्रहार करना होगा | उन्होंने कॉंग्रेस वर्किंग कमेटी को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक जन-आंदोलन शुरू करने के लिए राजी किया |

ग्वालिया टैंक मैदान (अगस्त क्रांति मैदान ) की हुंकार

 तारीख थी 8 अगस्त 1942 | जगह -बॉम्बे (अब मुंबई) का ग्वालिया टैंक मैदान | अखिल भारतीय काँग्रेस कमेटी की अधिवेशन चल रहा था | पूरा मैदान खचाखच भरा था | हर आँख मे एक ही सपना था – आजादी | यहीं पर एतिहासिक “भारत छोड़ो प्रस्ताव” (quit India Resolution) पारित किया गया |

गांधी का अमर मंत्र: “करो या मरो”(Do or Die)

इसी रात, आमतौर पर शांत रहने वाले महात्मा गांधी ने एक ऐसा जोशीला और आक्रमक भाषण दिया जिसने पूरे देश की रगों मे बिजली दौड़ा दी |

उन्होंने कहा,

“मैं आपको एक मंत्र देता हूं, एक छोटा सा मंत्र।। वह है ‘करो या मरो’ | हम या तो भारत को आज़ाद कराएंगे या इस प्रयास में अपनी जान दे देंगे| हम अपनी गुलामी को हमेशा के लिए देखने के लिए ज़िंदा नहीं रहेंगे |”

यह सिर्फ नारा नहीं था, यह एक प्रतिज्ञा थी | इसने देशवासियो  को बता दिया कि अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं हैं |

ऑपरेशन जीरो ओवर: ब्रिटिश हुकूमत का कायरतापूर्ण कदम 

अंग्रेज भी बेवकूफ नहीं थे| उन्हे पता था कि अगर गांधीजी ने यह आंदोलन शुरू कर दिया, तो उनकी खैर नहीं | इसलिए उन्होंने एक बेहद कायरतापूर्ण योजना बनाई, जिसे ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ (operation zero hour) नाम दिया गया |

शीर्ष नेताओ की रातों-रात गिरफ़्तारी 

9 अगस्त की सुबह सूरज निकलने से पहले ही पुलिस ने धाबा बोल दिया | महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार बल्लभभाई पटेल, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद-लगभग हर बड़े नेता को गिरफ्तार कर लिया गया | कॉंग्रेस को एक गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया गया | अंग्रेजों को लगा कि कुचल देने से सांप पर जाएगा, लेकिन वे गलत थे|

नेतृत्वहीन आंदोलन: जब जनता खुद बनी नेता 

क्या नेताओं की गिरफ़्तारी से आंदोलन रुक गया? बिल्कुल नहीं ! बल्कि यह आग की तरह फैल गया | यह इतिहास के उन चुनिंदा आंदोलनों में से एक है जो नेतृत्वहीन (Leaderless) होते हुए भी इतने बड़े स्तर पर लड़ा गया | जब कोई बड़ा नेता दिशा निर्देश देने के लिए नहीं बचा, तो भारत की आम जनता खुद अपनी नेता बन गई |

आंदोलन के विभन्न वर्गों की भागीदारी 

  • छात्र एवं युवा(Student & youth): इस आंदोलन मे इनकी भागीदरी थी 35% थी|
  • किसान एवं मजदूर(Farmer & Workers): इनकी भागीदारी 40% थी |
  • महिलाएं (Women Participation): इस आंदोलन मे इनकी भागीदारी 15% थी|
  • सरकारी कर्मचारी(त्यागपत्र देने वाले ): इनकी भागीदारी 5% थी |
  • व्यापारी एवं अन्य (merchants & others): इनकी भागीदारी 5%

विद्रोह की ज्वाला:पूरे देश मे जन-आक्रोश का विस्फोट

9 अगस्त की सुबह जब लोगों को पता चला कि उनके महबूब नेता जेल में हैं, तो उनका गुस्सा फूट पड़ा | जो आंदोलन शांतिपूर्ण तरीके से शुरू होना था, वह रातों-रात एक उग्र क्रांति में बदल गया |

हड़ताले, प्रदर्शन और तोड़फोड़ का दौर 

पूरे देश में कारखानों, स्कूलों और कॉलेजों में हड़ताले हो गई | लाखों लोग सड़कों पर उतर आए | जब पुलिस ने लाठीचार्ज किया और गोलियां चलाई, तो भीड़ भी हिंसक हो गई | लोगों ने अंग्रेजी राज के प्रतीकों पर हमला किया – रेलवे स्टेशन जला दिए गए, टेलीग्राफ की तारे काट दी गई, और पुलिस स्टेशनो पर तिरंगा फहराने की कोशिशे हुई |

छात्रों, महिलाओ और मजदूरों की अभूतपूर्व भागीदारी 

इस आंदोलन की सबसे बड़ी खूबसूरती थी इसमें हर वर्ग ही हिस्सेदारी | क्या आपने अरुण आसफ अली का नाम सुना हैं ? जब सारे नेता गिरफ्तार हो गए, तो इस शेरनी ने ग्वालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया था | छात्र अपनी किताबें छोड़कर सड़कों पर आ गए थे | अहमदाबाद और जमशेदपुर के कारखानों में मजदूरों ने हफ्तों लंबी हड़ताले कर दीं,जिस से अंग्रेजों की युद्ध सामग्री का उत्पादन ठप हो गया |

भूमिगत गतिविधियां और संनान्तर सरकारें (Parallel Government)

जब खुलेआम विरोध करना असंभव हो गया, तो कई युवा नेताओ ने अंडरग्राउंड (भूमिगत ) होकर आंदोलन की कमान संभाली |राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण (जेपी), और अच्युत पटवर्धन जैसे नेताओं ने छुपकर बम बनाए, गुप्त पर्चे छापे और आम जनता का मनोबल बनाए रखा।

Quit India Movement

खुफिया रेडियो स्टेशन: उषा मेहता का साहस 

उस समय की सबसे रोमांचक कहानियों मे एक है उषा मेहता की | महज़ 22 साल की उम्र में उन्होंने एक गुप्त काँग्रेस रेडियो स्थापित किया | वह रोज जगह-बदल कर रेडियो से नेताओ के संदेश जनता तक पहुंचाती थीं | यह रेडियो कहता था, “यह कांग्रेस रेडियो है, भारत के किसी अज्ञात स्थान से…”। इसने पुलिस की नाक में दम कर दिया था।

बलिया, सतारा और मिदनापुर की स्वतंत्र सरकारें 

कुछ जगहों पर तो लोगों ने अंग्रेजी सत्ता को पूरी तरह उखाड़ फेंका और अपनी खुद की ‘संनान्तर सरकारें (Parallel Government) बना लीं | क्या आप यकीन कर सकते है कि देश आज़ाद होने से 5 साल पहले ही इन जगहों पर तिरंगा लहरा रहा था ?

स्थान प्रमुख नेता विशेषता / कार्य 
बलिया(उत्तर प्रदेश )चित्तू पांडेपहली समानांतर सरकार | जेल के दरवाजे खोलकर सभी राजनीतिक कैदियों को रिहा कर दिया गया |
तामलुक (मिदनापुर, बंगाल )सतीश सामंत (जातीय सरकार)इन्होंने एक सशस्त्र ‘विद्युत वाहिनी’ बनाई। गरीबों को अनाज बांटा और अपनी खुद की न्याय व्यवस्था शुरू की।
सतारा (महाराष्ट्र )वाई.बी. चव्हाण, नाना पाटिलसबसे लंबे समय तक चलने वाली समानांतर सरकार (प्रति सरकार )| जन आंदोलन (न्यायदान मंडल ) लगाई गई |

आंदोलन का प्रभाव

ब्रिटिश दमन चक्र: गिरफ़्तारी और शहादत  

अंग्रेजों ने इस जन-विद्रोह को कुचलने के लिए क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं |मशीनगनों से अंधाधुंध फायरिंग की गई, गांवों पर हवाई जहाजों से बम गिराए गए और भारी सामूहिक जुर्माना वसूला गया। आइए इन डरावने आंकड़ों पर एक नज़र डालें:

Quit India Movement

डेटा स्रोत: विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेज़ों के अनुमानित आंकड़े। यह बार चार्ट स्पष्ट रूप से दिखाता है कि ब्रिटिश सरकार ने आंदोलन को दबाने के लिए कितनी बड़ी संख्या में गिरफ्तारियां कीं और जुर्माना (लाखों रुपयों में) वसूला।

आंदोलन का पतन और एतिहासिक महत्व

 1943 के अंत तक आते-जाते, अंग्रेजों की विशाल सैन्य शक्ति,निर्मम दमन, और नेताओं की अनुपस्थिति के  कारण यह आंदोलन धीरे-धीरे शांत होने लगा | भौतिक रूप से अंग्रेजों ने सड़कों पर कब्ज़ा वापस पा लिया था |

क्या भारत छोड़ो आंदोलन विफल रहा? एक विश्लेषण 

अगर आप सिर्फ इस बात से सफलता मापते हैं कि क्या 1942 में ही अंग्रेज भारत छोड़कर चले गए ? तो जवाब है नहीं। लेकिन क्या यह आंदोलन विफल था ? बिल्कुल नहीं ! यह एक शानदार रणनीतिक जीत थी | इस आंदोलन ने भारत के जनता के अंदर से पुलिस और जेल का डर हमेशा के लिए खत्म कर दिया था |

आजादी की नींव : साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील

अगस्त क्रांति ने पूरी दुनिया और खुद ब्रिटेन को यह सख्त संदेश दे दिया कि अब भारत पर उनकी मर्जी के खिलाफ शासन करना असंभव है | इस आंदोलन ने उस जमीन को तैयार कर दिया जिस पर 1947 में आजादी की इमारत खड़ी हुई | अगर 1857 का गदर आजादी की पहली लड़ाई थी, तो 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन उसका निर्णायक और अंतिम युद्ध था |

निष्कर्ष: एक नए सवेरे की आहट 

अंत मे, हम यही कह सकते है कि “भारत छोड़ो आंदोलन” महज इतिहास के पन्नों में दर्ज एक तारीख नहीं हैं | यह भारत की अदम्य इच्छाशक्ति, साहस और बलिदान का सबसे बड़ा प्रमाण है | जब देश का आम आदमी—किसान, मजदूर, छात्र, महिला—बिना किसी नेता के एक महाशक्ति से भिड़ गया, तो उसने साबित कर दिया कि जब राष्ट्र जागता है, तो बड़ी से बड़ी हुकूमतों के सिंहासन डोल जाते हैं। हमें उन अज्ञात शहीदों को कभी नहीं भूलना चाहिए जिन्होंने ‘करो या मरो’ के पथ पर चलकर अपने प्राणों की आहुति दे दी, ताकि हम आज खुली हवा में सांस ले सकें। जय हिंद!

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल 

8 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो प्रस्ताव पास होने के बाद, ब्रिटिश पुलिस ने 9 अगस्त की सुबह तड़के (शून्य काल या Zero Hour पर) अचानक कार्रवाई करते हुए महात्मा गांधी, नेहरू और पटेल सहित कांग्रेस के सभी शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। इसी पुलिस कार्रवाई को ‘ऑपरेशन जीरो आवर’ कहा गया।

हालांकि गांधीजी ने इस आंदोलन को अहिंसक रखने का आह्वान किया था, लेकिन नेताओं की गिरफ्तारी और ब्रिटिश पुलिस के क्रूर दमन (लाठीचार्ज, फायरिंग) के कारण भीड़ बेकाबू हो गई। कई जगहों पर हिंसक घटनाएं हुईं, रेलवे पटरियां उखाड़ी गईं और सरकारी इमारतों पर हमले हुए। इसलिए इसे पूर्णतः अहिंसक नहीं कहा जा सकता।

मुंबई में ‘सीक्रेट कांग्रेस रेडियो’ (Secret Congress Radio) चलाने का साहसिक काम मुख्य रूप से उषा मेहता ने राममनोहर लोहिया और अन्य साथियों के साथ मिलकर किया था। यह रेडियो पुलिस से छिपकर पूरे देश में नेताओं के संदेश प्रसारित करता था।

इस आंदोलन के दौरान भारत के कई हिस्सों में ब्रिटिश राज को खत्म कर लोगों ने अपनी सरकारें बना ली थीं। प्रमुख स्थान थे: बलिया (यूपी) में चित्तू पांडे के नेतृत्व में, तामलुक (मिदनापुर, बंगाल) में ‘जातीय सरकार’, और सतारा (महाराष्ट्र) में ‘प्रति सरकार’, जो सबसे लंबे समय तक चली थी।



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