शिवराम हरि राजगुरु: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक अनसुना नायक
नमस्ते दोस्तों! जब भी हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बात करते हैं , तो कुछ नाम हमारी जुबान पर तुरंत आ जाते हैं जैसे महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, और बेशक, शहीद-ए-आज़म भगत सिंह| लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इतिहास के पन्नों में कुछ नाम ऐसे भी हैं जो अक्सर बड़े नामों की परछाई में छिप जाते हैं ? आज मैं आपसे एक ऐसे ही शेरदिल इंसान के बारे में बात करने जा रहा हूँ| एक ऐसा नौजवान जिसके रगों मे खून नहीं, बल्कि देशप्रेम का लावा दौड़ता था| जी हाँ, आपने सही पहचाना| मैं बात कर रहा हूँ शिवराम हरि राजगुरु की
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!जरा सोचिए उस 22 साल के युवा के बारे में, जिसने अपनी ज़िंदगी के बेहतरीन साल देश के नाम कर दिए | क्या आपको नहीं लगता कि हमें उनकी कहानी को और गहराई से जानने की जरूरत है? चलिए, आज इस लेख के जरिए राजगुरु के जीवन के उन पन्नों को पलटते हैं, जिन्हे शायद हमने कभी गौर से नहीं पढ़ा |
परिचय:कौन थे राजगुरु?
शिवराम हरि राजगुरु, भारतीय इतिहास का वो चमकता सितारा हैं, जिन्होंने ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ (HSRA) के एक प्रमुख सदस्य के रूप में अपनी पहचान बनाई| आप उन्हे भगत सिंह और सुखदेव के अभिन्न मित्र और साथी के रूप मे जानते होंगे | लेकिन राजगुरु सिर्फ एक ‘साथी’ नहीं थे; वे अपने आप में एक पूरी क्रांति थे| वे एक अचूक निशानेबाज, एक निडर योद्धा और एक सच्चे देशभक्त थे| उनका नाम लेते ही जेहन में 1928 का वह वाकया आ जाता है, जिसने ब्रिटिश सम्राज्य की नींव हिला कर रख दी थी|
प्रारंभिक जीवन और जन्मस्थान
राजगुरु का जन्म 24 अगस्त 1908 को महाराष्ट्र के पुणे जिले के पास एक छोटे से गाँव ‘खेड़’ में हुआ था | उनका पिता का नाम हरि नारायण और माता का नाम पार्वती बाई था | राजगुरु जब महज 6 साल के थे, तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया | लेकिन कहते हैं ना, “होनहार बिरवान के होत चिकने पात |” राजगुरु बचपन से ही बाकी बच्चों से बिल्कुल अलग थे|
बचपन की कुछ अनसुनी कहानियाँ और विद्रोह के बीज
राजगुरु स्वभाव से बेहद चंचल और विद्रोही थे| उनका मन किताबी पढ़ाई में कम और खेल-कूद, कुश्ती औ शारीरिक व्यायाम में ज्यादा लगता था| एक बार की बात है, जब वे स्कूल में अंग्रेजी विषय में फेल हो गए, तो उनके बड़े भाई ने उन्हे बहुत डांटा और अंग्रेजी पढ़ने का दवाब डाला | राजगुरु को यह बात इतनी चुभ गई कि उन्होंने घर छोड़ने का फैसला कर लिया | महज़ 15 साल की उम्र में, कुछ पैसे और एक सपना लेकर यह लड़का अपने घर से निकल पड़ा | यह कोई आम भगोंडापन नहीं था ; यह एक महान यात्रा की शुरुआत थी|
क्रांति की ओर पहला कदम
घर छोड़ने के बाद राजगुरु की ज़िंदगी ने एक नया मोड़ लिया | यह वह समय था जब पूरे देश में आज़ादी की आग सुलग रही थी, औ राजगुरु का दिल इस आग में कूदने के लिए बेताब था|
वाराणसी की यात्रा और विद्या अध्ययन
पुणे से निकलकर राजगुरु पवित्र नगरी वाराणसी (काशी) पहुँचे| वाराणसी उस समय केवल धर्म और संस्कृति का केंद्र नहीं था, बलकि क्रांतिकारियों का गढ़ भी था | वहां उन्होंने संस्कृत सीखी, हिन्दू धर्मग्रंथों का गहन अध्ययन किया और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से प्रभावित हुए | लेकिन उन्होंने सिर्फ किताबी ज्ञान नहीं लिया| उन्होंने कुश्ती के अखाड़ों में अपना पसीना बहाया और अस्त्र-शस्त्र चलाने की विद्या भी सीखी | वाराणसी ने उनके अंदर के विद्रोही को एक दिशा दी|
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़ाव
वाराणसी में ही राजगुरु का संपर्क कई क्रांतिकारियों से हुआ| उनकी निडरता, उनकी फिटनेस और उनकी अचूक निशानेबाजी ने जल्द ही बड़े नेताओ का ध्यान अपनी ओर खींचा | चंद्रशेखर आज़ाद, जो उस समय HSRA के कमांडर-इन-चीफ थे, राजगुरु की प्रतिभा से बेहद प्रभावित हुए| आज़ाद ने राजगुरु को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया | पार्टी के अंदर राजगुरु को “रघुनाथ” के नाम से जाना जाने लगा | यहीं से उनकी ज़िंदगी का असली मकसद शुरू हुआ|
भगत सिंह और सुखदेव के साथ अटूट दोस्ती
जब आप राजगुरु की बात करते हैं तो भगत सिंह और सुखदेव का जिक्र आना लाज़मी है | ये तीनों सिर्फ एक पार्टी के सदस्य नहीं थे, बल्कि एक ही जिस्म की तीन अलग-अलग जान थे|
विचारधारा और उग्र राष्ट्रवाद
राजगुरु की विचारधारा थोड़ी अलग थी | भगत सिंह जहाँ बहुत ज्यादा पढ़ते थे और एक समाजवादी विचारधारा पर ज़ोर देते थे, वहीं राजगुरु शिवाजी महराज और महाराणा प्रताप जैसे योद्धाओ से प्रेरित थे| उनका मानना था कि आज़ादी भीख में नहीं मिलेगी, इस हथियारों के बल पर छीनना होगा | जब पार्टी में किसी खतरनाक मिशन की बात होती, तो राजगुरु का हाथ सबसे पहले उठता था | वे अक्सर भगत सिंह से मज़ाक मे कहते थे ,
“तुम किताबें पढ़ते रहो, मैं अंग्रेजों को गोलियों से पढ़ाऊँगा ”
उनका राष्ट्रवाद उग्र था, शुद्ध था और किसी भी समझौते के खिलाफ था|
लाला लाजपत राय की मौत का बदला
भारतीय इतिहास में 1928 का साल बहुत अहम है | साइमन कमीशन भारत आया था और पूरे देश मे उसका विरोध हो रहा था | लाहौर में इस विरोध का नेतृत्व पंजाब केसरी लाला लाजपत राय कर रहे थे | ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट ने लाठीचार्ज का आदेश दिया , जिसमें लाला जी गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मुत्यु हो गई|
सॉन्डर्स हत्याकांड (1928): एक ऐतिहासिक कदम
लाला जी की मौत ने पूरे देश को झकझोर दिया| HSARA ने कसम खाई कि वे इसका बदला लेंगे | योजना बनी स्कॉट को मारने की | लेकिन 17 दिसम्बर 1928 को, पहचान में गलती होने के कारण स्कॉट की जगह जॉन पी सॉन्डर्स (J.P. Saunders) पुलिस स्टेशन से बाहर निकला।
राजगुरु की अचूक निशानेबाजी का कमाल
यह वह पाल था जहाँ राजगुरु ने अपना कौशल दिखाया | जैसे ही सॉन्डर्स अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करने लगा, राजगुरु ने आगे बढ़कर अपनी पिस्तौल से पहली गोली सीधे सॉन्डर्स के माथे पर दाग दी | वह वहीं ढेर हो गया | राजगुरु का निशाना इतना अचूक था कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं मिला | उसके बाद भगत सिंह ने आगे आकर कई गोलियां दागी ताकि यह पक्का हो सके कि लाला जी का कातिल ज़िंदा न बचे | यह के ऐसा कदम था जिसने पूरे ब्रिटिश सम्राज्य में दहशत फैला दी|
लाहौर से भागने की रोमांचक योजना
सॉन्डर्स को मारने के बाद लाहौर पुलिस छावनी में तब्दील हो गया था| अंग्रेजों ने चप्पे-चप्पे पर नाकेबंदी कर दी थी | यहाँ से भागना नामुमकिन सा लग रहा था, लेकिन इन वीरों की बुद्धिमानी ने कमाल किया |
दुर्गवाती देवी (दुर्गा भाभी ) की मदद से एक योजना बनी | भगत सिंह ने अपने बाल कटवा लिए औ एक अंग्रेज बाबू का भेष धरा, दुर्गा भाभी उनकी पत्नी बनीं | और हमारे राजगुरु? राजगुरु ने एक फटे-पुराने कपड़े पहनकर उनके नौकर का भेष धारण किया, जो सिर पर सूटकेस रखकर उनके पीछे चल रहा था | क्या गजब का अभिनय था ! पुलिस देखती रह गई और ये क्रांतिकारी लाहौर से सुरक्षित कलकत्ता निकल गए |
गिरफ़्तारी और जेल का कठिन जीवन
क्रांतिकारी जीवन कभी आसान नहीं होता | कलकत्ता औ आगरा में कुछ समय बिताने के बाद राजगुरु फिर से सक्रिय हो गए | 1929 में जब वे पुणे मे एक ब्रिटिश अधिकारी को मारने की योजना बना रहे थे, तब किसी मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने उन्हे गिरफ्तार कर लिया |
भूख हड़ताल और जेल प्रशासन से संघर्ष
जेल में भी राजगुरु का विद्रोही स्वभाव शांत नहीं हुआ | जब भगत सिंह और जतिन दास ने जेल में राजनीतिक कैदियों के अधिकारों के लिए भूख हड़ताल शुरू की, तो राजगुरु ने भी उनका पूरा साथ दिया | उन्होंने महीनों तक खाना नहीं खाया | अंग्रेजों ने उन्हे जबरन खाना खिलाने की कोशिश की, उन पर अमानवीय अत्याचार किए, लेकिन राजगुरु का संकल्प नहीं टूटा | यही उनके दृढ़ निश्चय का सबसे बड़ा प्रमाण था कि मौत सामने देखकर भी वे मुसकुराते रहे|
लाहौर षड्यन्त्र केस और फांसी की सजा
राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव पर ‘लाहौर षड्यन्त्र केस’ के तहत मुकदमा चलाया गया | यह अदालत एक नाटक से ज्यादा कुछ नहीं थी | क्रांतिकारियों ने अदालत का इस्तेमाल अपने विचारों को जनता तक पहुँचाने के मंच के रूप मे किय| आखिरकार, वही हुआ जिसका डर था – तीनों को फाँसी की सजा सुनाई गई | सजा की तारीख 24 मार्च 1931 तय की गई थी |
23 मार्च 1931: शहादत का वह काला दिन
अंग्रेज सरकार जनता के गुस्से से इतनी डरी हुई थी कि उन्होंने तय समय से 11 घंटे पहले ही, 23 मार्च 1931 की शाम 7:30 बजे गुपचुप तरीके से तीनों को फांसी दे दी| कहते हैं की जब ये तीनों फाँसी के तख्ते की ओर जा रहे थे, तो वे ‘मेरे रंग दे बसंती चोला’ गा रहे थे | राजगुरु के चेहरे पर जरा सा भी खौफ नहीं था | मात्र 22 साल और कुछ महीनों की उम्र में , शिवराम हरि राजगुरु ने हँसते-हँसते को गले लगा लिया और भारत माता की वेदी पर अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया|
राजगुरु की विरासत और हमारा आज का समाज
आज राजगुरु हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी विरासत आज भी ज़िंदा है उनके सम्मान मे उनके जन्मस्थान ‘खेद’ का नाम बदलकर ‘राजगुरुनगर’ कर दिया गया है| लेकिन क्या सिर्फ नाम बदलना काफी है ? क्या हम वास्तव में उस आज़ादी की कद्र कर रहे हैं जिसके लिए राजगुरु जैसे वीरों ने अपना खून बहाया?
आज के युवाओ के लिए राजगुरु का शाश्वत संदेश
राजगुरु का जीवन आज के युवाओ के लिए एक बहुत बड़ा सबक है | आज जब युवा अपने करियर, सोशल मीडिया और छोटी-छोटी परेशानियों में उलझे रहते हैं, तो उन्हे राजगुरु को याद करना चाहिए | राजगुरु ने हमे सिखाया की जब बात राष्ट्र की हो, तो कोई भी बलिदान बड़ा नहीं होता | उन्होंने हमे सिखाया कि निडरता और मातृभूमि से सच्चा प्रेम क्या होता हैं | उनका संदेश साफ हैं: अपने देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझो औ अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने से कभी मत डरो |
निष्कर्ष: एक अमर बलिदानी को शत-शत नमन
तो दोस्तों, यही थी शिवराम हरि राजगुरु की वह कहानी जो अक्सर किताबों के छोटे से पैराग्राफ मे सिमट कर रह जाती है | राजगुरु सिर्फ भगत सिंह के साथी नहीं थे, वे एक स्वतंत्र तूफान थे जिसने ब्रिटिश हुकूमत को जड़ से हिला दिया था | उनकी बहादुरी, उनका त्याग और देश के लिए उनका पागलपन हमेशा हमारे दिलों में एक ज्योति जलाए रखेगा | 23 मार्च को हम शहीद दिवस मनाते हैं, लेकिन सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी जब हम राजगुरु के सपनों को भारत बनाएंगे एक ऐसा भारत जहाँ न्याय हो, समानता हो और हर नागरिक के दिल में देशप्रेम की भावना हो | आइय, उस महान आत्मा को आज हम मिलकर शत-शत नमन करे | जय हिंद !
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
राजगुरु ने किस ब्रिटिश अधिकारी की हत्या की थी और क्यों ?
राजगुरु ने 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सॉन्डर्स (J.P. Saunders) की हत्या की थी। यह हत्या पंजाब केसरी लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए की गई थी, जिनकी मृत्यु पुलिस लाठीचार्ज के कारण हुई थी।
राजगुरु को किस दिन फांसी दी गई थी ?
राजगुरु को उनके साथियों भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 की शाम को लाहौर सेंट्रल जेल मे फाँसी दी गई थी|इस दिन को भारत में ‘शहीद दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।
HSRA पार्टी में राजगुरु को किस नाम से पुकारा जाता था ?
हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) पार्टी के अंदर राजगुरु को उनके साथी ‘रघुनाथ’ के नाम से बुलाते थे। वे पार्टी के मुख्य निशानेबाज थे।
लाहौर से भागते समय राजगुरु ने किसका भेष धारण किया था ?
सॉन्डर्स हत्याकांड के बाद लाहौर से सुरक्षित निकलने के लिए राजगुरु ने एक नौकर का भेष धारण किया था। वे सामान सिर पर रखकर भगत सिंह (जो एक अंग्रेज बाबू के भेष में थे) के पीछे-पीछे चले थे।