प्रस्तावना :
क्या आपने कभी सोचा है कि 15 अगस्त को तिरंगा फहराते समय हम गर्व करते हैं? यह सिर्फ एक झंडा नहीं बल्कि यह उन लाखों संघर्षों और बलिदानों का प्रतीक है जिन्होंने भारत को एक ‘राष्ट्र’ बनाया| आइए , इस अनकही और गहरी यात्रा पर चलते हैं |
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!भारत मे राष्ट्रवाद
दोस्तों,जब भी भारत स्टेडियम मे भारत-पाकिस्तान का मैच होता है और जन गण मण बजता है, तो दिल की धड़कने क्यों तेज़ हो जाती हैं? यह जो भावना आपके अंदर उमड़ती है, यही राष्ट्रवाद है। लेकिन क्या भारत हमेशा से एक “राष्ट्र” था ? सच कहूँ तो, नहीं| भारत पहले छोटे-छोटे राज्यों, रजवाड़ों और रियासतों का एक समूह था | तो फिर कश्मीर से कन्याकुमारी तक अलग-अलग भाषा, खान-पान और पहनावे वाले लोग एक धागे मे कैसे बंध गए ? यही कहानी है “भारत मे राष्ट्रवाद (nationalism in India) की | यह कोई एक दिन का चमत्कार नहीं था , बल्कि दशकों के संघर्ष, खून-पसीने और वैचारिक क्रांति का नतीजा था | आइए, इस दिलचस्प सफ़र पर एक नजर डालते है|
राष्ट्रवाद क्या है ? एक सरल परिभाषा
किताबी भाषा छोड़कर आसान तरीके से समझें, तो राष्ट्रवाद एक ऐसी भावना है
जो अलग-अलग जगह, धर्म और जाति के लोगों को यह एहसास दिलाती है की “ हम सब एक ही हैं |” यह दिखती नहीं है, लेकिन लोगों को अंदर से जोड़कर रखती है |
भारत के संदर्भ मे, यही भावना लोगों को एक साथ लाई | पहले लोग अपने-अपने मतभेदों मे उलझे हुए ठे, लेकिन जैसे-जैसे उन्हे समझ आया कि उनका असली दुश्मन एक ही है- अंग्रेज हुकूमत वे धीरे-धीरे एकजुट होने लगे|
भारत में राष्ट्रवाद के बीज: शुरुआत कहाँ से हुई ?
भारत मे राष्ट्रवाद का कोई एक “जनक” नहीं है| यह कई घटनाओ का मिल-जुला परिणाम था| अंग्रेज भारत आए तो थे व्यापार करने, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने यहाँ की जमीन, अर्थवस्वस्था और समाज पर कब्जा कर लिया| उनकी दमनकारी नीतियों ने अनजाने म ही भारतीयों को एकजुट कर दिया|
1857 की क्रांति : पहला स्वतंत्रता संग्राम
जरा सोचिए मंगल पांडे के उस गुस्से के बारे में | 1857 का विद्रोह, जिसे अंग्रेज सिर्फ एक सिपाही ‘सिपाही विद्रोह’ कहते थे , असल मे राष्ट्रवाद की पहली बड़ी चिंगारी थी| रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, और कुंवर सिंह जैसे नेताओ मे अपने-अपने इलाकों मे लड़ाई लड़ी | भले ही यह विद्रोह पूरे भारत मे नहीं फैला सका और इसे बेरहमी से कुचल दिया गया, लेकिन इसने भारतीयों के मन मे एक बीज बो दिया कि “हम इन फिरंगियों को बाहर निकाल सकते हैं |” इस घटना ने एक मनोवैज्ञानिक जीत हासिल की|
पश्चिमी शिक्षा और विचारों का प्रभाव
यह इतिहास का एक दिलचस्प विरोधाभास है| अंग्रेजों ने भारतीयों को क्लर्क बनाने के लिए अंग्रेजी शिक्षा शुरू की थी| लेकिन इसी शिक्षा ने भारतीयों को जॉन लॉक, रूसो और मैजिनी जैसे विचारको को पढ़ने का मौका दिया | स्वतंत्रता, समानता और लोकतंत्र जैसे शब्द अब पढे-लिखे भारतीयों की जुबान पर थे| अंग्रेजी भाषा ने पूरे देश के बुद्धिजीवियों को आपस मे बात करने का एक जरिया दे दिया| अब बंगाल का एक पढ़ा-लिखा व्यक्ति मद्रास के एक व्यक्ति से देश की संसस्याओ पे चर्चा कर सकता था|
सामाजिक और धार्मिक सुधार आंदोलन
कोई भी देश तब तक आज़ाद नहीं हो सकता जब तक वह अपनी अंदरूनी कमजोरियों से न लड़े| 19वीं सदी मे भारत अधविश्वासों,सती प्रथा, छुआछूत और जातिवाद मे जकड़ा हुआ था| ऐसे मे कई समाज सुधारकों ने मोर्चा संभाला|उनका मानना था की एक मजबूत और एकजुट समाज ही अंग्रेजों का मुकाबला कर सकता हैं|
राजा राममोहन राय और ब्राह्मण समाज
आधुनिक भारत के निर्माता कहे जाने वाले राजा राम मोहन राय ने सती प्रथा के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी और 1829 मे इसे खत्म करवाया | उन्होंने ‘ब्रह्म समाज’ की स्थापना की जो तार्किकता और समानता पर ज़ोर देता था| उन्होंने लोगों को यह सिखाया की अपने अधिकारों के लिए लड़ना जरूरी है|
स्वामी विवेकानंद और रामकृष्ण मिशन
उठो और जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए
स्वामी विवेकानंद के इन शब्दों ने सोए हुए भारतीय युवाओ मे एक नई ऊर्जा भर दी| उन्होंने दुनिया को भारतीय संस्कृति की महानता दिखाई और भारतीयों के अंदर खोय हुए आत्मसम्मान को वापस जगाया| यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक बेहतरीन उदाहरण था|
भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की स्थापना (1885)
1885 में ए.ओ. ह्यूम (एक रिटायर्ड ब्रिटिश अधिकारी) की मदद से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) की स्थापना हुई। शुरुआत मे यह कोई क्रांतिकारी संगठन नहीं था | यह सिर्फ पढे-लिखे वकीलों और पत्रकारों का एक समूह था जो अंग्रेजों से प्रार्थना पत्र (Petitions) देकर कुछ रियासतें मांगते थे| लेकिन, यह पूरे भारत के नेताओ के लिए एक साझा मंच बन गया|
काँग्रेस के भीतर वैचारिक विभाजन (1990 के दशक की शुरुआत )
यह चार्ट दर्शाता है की कैसे स्वतंत्रता प्राप्ति के तरीकों को लेकर नेताओं की विचारधारा बंटी हुई थी (यह डेटा विश्लेषणात्मक प्रतिनिधित्व के लिए अनुमानित है )
नरम दल बनाम गरम दल
जैसे-जैसे समय बीता, कांग्रेस के अंदर ही दो गुट बन गए| एक थे नरमपंथी (Moderates) जैसे दादाभाई नौरोजी और गोपाल कृष्ण गोखले, जो शांतिपूर्ण तरीके से ब्रिटिश शासन के भीतर ही सुधार चाहते थे| दूसरे थे गरमपंथी (Extremists) जैसे लाल-बाल-पाल (लाला लाजपत राय, बाल गंगाधर तिलक,विपिन चंद्र पाल)| तिलक ने नारा दिया था
स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मै इसे लेकर रहूँगा
गरम दल वाले हड़ताल, वाहिष्कार और जन आंदोलन में विश्वास रखते थे| 1905 के बंगाल विभाजन ने गरमपंथी विचारधारा को बहुत मजबूत किया|
गांधी युग का उदय (1915 के बाद )
1915 मे जब महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे, तो भारत के राजनीतिक पटल पर एक ऐसा तूफान आया जिसने सब कुछ बदल दिया | गांधी जी ने राष्ट्रवाद को वकीलों के चैंबर से निकालकर गांव-गांव , खेत-खेत तक पहुँचा दिया | उन्होंने ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ को हथियार बनाया |
चंपारण,खेड़ा और अहमदाबाद सत्याग्रह
गांधी जी ने सीधे कोई बड़ा राष्ट्रीय आंदोलन नहीं छेड़ा| उन्होंने पहले जमीनी स्तर पर काम किया| बिहार के चंपारण (1917) मे नील के किसानों के लिए गुजरात के खेड़ा (1918) के कर माफी के लिए, और अहमदाबाद (1918) मे मिल मजदूरों के लिए उन्होंने सफल सत्याग्रह किए| इन जीतो ने आम आदमी को विश्वास दिलाया की गांधी जी की अहिंसक तकनीक अंग्रेजों को झुका सकती है|
असहयोग आंदोलन: जब पूरा देश एक हुआ
जलियावाला बाग हत्याकांड (1919) की क्रूरता ने पूरे देश को झकझोर दिया था | इसके जवाब मे 1920 मे गांधी जी ने असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) शुरू किया | इसका संदेश सीधा था
अंग्रेज हम पर इसलिए राज कर पा रहे हैं क्योंकि हम उनके साथ सहयोग कर रहे हैं | अगर हम सहयोग करना बंद कर दें तो उनका शासन ढह जाएगा |
छात्रों ने स्कूल छोड़ दिए, वकील ने अदालत छोड़ दीं और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई| खादी सिर्फ एक कपड़ा नहीं ,बल्कि प्रतिरोध का राष्ट्रीय प्रतीक बन गई|
चौरी-चौरा की घटना और आंदोलन वापसी
आंदोलन चरम पर था , लेकिन 1922 मे उत्तर प्रदेश के चौरी-चौरा मे एक गुस्साई भीड़ ने के पुलिस स्टेशन मे आग लगा दी, जिसमे 22 पुलिसकर्मी मारे गए| गांधी जी सिद्धांतों के पक्के थे| उन्होंने कहा की भारत अभी अहिंसक आंदोलन के लिए पूरी तरह तैयार नहीं है, और उन्होंने यह विशाल आंदोलन तुरंत वापस ले लिया| इससे कई युवा नेता निराश हुए,लेकिन गांधी जी का विजन दीर्घकालिक था|
प्रमुख जन आंदोलन मे अनुमानित भागीदारी
यह ग्राफ गाँधीवादी आंदोलनों की बढ़ती हुई लोकप्रियता और जनसमर्थन (लाखों में ) को दर्शता है|
सविनय अवज्ञा आंदोलन और दांडी मार्च
1930 मे राष्ट्रवाद का एक नया अध्याय लिखा गया | गांधी जी ने अंग्रेज के अन्यायपूर्ण नमक कानून को तोड़ने का फैसला किया | नमक एक ऐसी चीज थी जिसका इस्तेमाल आमिर और गरीब, हिन्दू और मुस्लिम सब करते थे| 78 अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से दांडी तक उनकी पैदल यात्रा (दांडी मार्च ) ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा | 6 अप्रैल 1930 को समुद्र तट पर मुट्ठी भर नमक बनाकर उन्होंने ब्रिटिश सम्राज्य की नींव हिला दी | यह सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) की शुरुआत थी यानि विनम्रतापूर्वक लेकिन दृढ़ता से गलत कानूनों को तोड़ना | इस आंदोलन मे महिलाओ की भागीदारी अभूतपूर्व थी|
क्रांतिकारी राष्ट्रवादी: भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और सुभाष चंद्र बोस
क्या राष्ट्रवाद सिर्फ शांतिपूर्ण धरने-प्रदर्शन तक सीमित था ? बिल्कुल नहीं ! देश के कई युवाओ का मानना था की अंग्रेज लातों के भूत है, बातों से नहीं मानेगे | भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद , राम प्रसाद बिस्मिल,अशफाकउल्ला खान जैसे वीरों ने अपनी जान की बाज़ी लगा दी | भगत सिंह ने असेंबली मे बम इसलिए नहीं फेंका था की किसी को मारना था , बल्कि इसलिए ताकि “बहरों को सुनाया जा सके|” उनकी फांसी ने पूरे देश के युवाओं मे देशभक्ति का ऐसा उबाल ला दिया जिसकी कोई मिसाल नहीं मिलती | दूसरी तरफ, नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने “तुम मुझे खून दो, मै तुम्हें आजादी दूंगा “ का नारा दिया | उन्होंने देश के बाहर जाकर आज़ाद हिन्द फौज (INA) का नेतृत्व किया और सैन्य ताकत स अंग्रेजों को चुनौती दी | उनकी रणनीतियों ने अंग्रेजी सेना मे मौजूद भारतीय सैनिकों के मन म भी राष्ट्रवाद की अलख जगा दी|
भारत छोड़ो आंदोलन (1942): करो या मारो
दूसरा विश्व युद्ध चल रहा था और भारत की जनता महंगाई और अकाल से त्रस्त थी | 8 अगस्त 1942 को गांधी जी ने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान से वह एतिहासिक भाषण दिया जिसने ताबूत मे आखिरी कील ठोक दी | उन्होंने नारा दिया “करो या मरो (Do or Die )”| अगले ही दिन सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिए गए | लेकिन अब राष्ट्रवाद की लहर इतनी मजबूत थी की बिना किसी बड़े नेता के भी , आम जनता न आंदोलन का नेतृत्व खुद संभाल लिया | पूरे देश मे समानांतर सरकारें बनने लगीं | अंग्रेजों को समझ आ गया था कि अब भारत पर राज करना मुमकिन नहीं है |
स्वतंत्रता प्राप्ति और विभाजन का दर्द (1947)
आखिरकार वह दिन आ गया | 15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ | लेकिन यह आजादी एक भारी कीमत मांग रही थी | धर्म के आधार पर देश का विभाजन हो चुका था भारत और पाकिस्तान | जो राष्ट्रवाद सांप्रदायिकता से लड़ते हुए पनपा था, उसी के एक हिस्से मे भयानक दंगे हुए | लाखों लोग बेघर हुए , हजारों मारे गए | यह भारतीय राष्ट्रवाद के इतिहास का सबसे काला और दर्दनाक अध्याय है,जो हमें यह याद दिलाता है की जब धर्म को राजनीति से मिला दिया जाता है , तो कितनी तबाही हो सकती हैं|
आधुनिक भारत मे राष्ट्रवाद के नए आयाम
1947 के बाद राष्ट्रवाद के मायने बदल गए | अब लड़ाई किसी बाहरी दुश्मन से नहीं थी बल्कि देश के निर्माण की थी | संविधान निर्माण, लोकतंत्र की स्थपना और एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य बनाना हमारे नए लक्ष्य थे | आज के दौर मे जब (ISRO) चंद्रयान लॉन्च करता है , या जब नीरज चोपड़ा ओलंपिक मे गोल्ड मेडल जीतते है , तब जो हमे खुशी होती है वह आधुनिक राष्ट्रवाद ही है | आज का राष्ट्रवाद विकास , समानता, और वैश्विक स्तर पर भारत को सशक्त बनाने के ईद-गिर्द घूमता है |
निष्कर्ष: क्या है असली भारतीय राष्ट्रवाद ?
भारत मे राष्ट्रवाद की कहानी एक ऐसी किताब की तरह है जिसमे वीरता, त्याग अहिंसा और खून-खराबे,सबके पन्ने है | असली भारतीय राष्ट्रवाद किसी एक धर्म या भाषा का मोहताज नहीं हैं | यह विविधता मे एकता (Unity in Diversity ) का सबसे बड़ा सबूत हैं | यह उस वादे का नाम है जो हमने अपने संविधान की प्रस्तावना मे किया है – न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व | जब तक हम अपने साथी नागरिकों का सम्मान करते हैं और देश की भलाई के लिए काम करते है तब तक हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के दिलों मे जल रही थी | जय हिन्द!
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
महात्मा गांधी के राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी खासियत क्या थी?
गांधी जी के राष्ट्रवाद की सबसे बड़ी खासियत ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ थी। उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को एलीट क्लास (अमीरों और पढ़े-लिखे लोगों) के ड्राइंग रूम से निकालकर आम किसानों, मज़दूरों और महिलाओं तक पहुँचाया। उन्होंने इसे एक सच्चा जन-आंदोलन बना दिया।
‘नरम दल’ और ‘गरम दल’ में क्या बुनियादी अंतर था?
नरम दल (Moderates) ब्रिटिश न्याय प्रणाली में विश्वास रखते थे और याचिकाएं व प्रार्थना पत्र देकर सुधार चाहते थे। वहीं, गरम दल (Extremists) का मानना था कि आज़ादी भीख में नहीं मिलेगी, इसे लड़कर लेना होगा। वे बहिष्कार, स्वदेशी और जन-हड़तालों पर ज़ोर देते थे।
स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की क्या भूमिका थी?
महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। रानी लक्ष्मीबाई से लेकर सरोजिनी नायडू, अरुणा आसफ अली, और कैप्टन लक्ष्मी सहगल (INA) तक महिलाओं ने नेतृत्व किया। गांधी जी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में हज़ारों महिलाओं ने पर्दा प्रथा तोड़कर पहली बार सड़कों पर आकर नमक कानून तोड़ा और शराब की दुकानों पर धरना दिया।
1857 की क्रांति को अक्सर ‘विफल’ क्यों कहा जाता है, और क्या यह सच में विफल थी?
इसे सैन्य दृष्टि से विफल कहा जाता है क्योंकि अंग्रेज़ों ने इसे कुचल दिया था और केंद्रीय नेतृत्व की कमी थी। लेकिन वैचारिक रूप से यह कभी विफल नहीं हुई। इसने भविष्य के स्वतंत्रता सेनानियों के लिए एक प्रेरणा का काम किया और भारत में राष्ट्रवाद का पहला मज़बूत बीज बोया।
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