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भारत मे बेरोजगारी

Unemployment

नमस्ते दोस्तों ! क्या आपने कभी सोचा है की हमारी अर्थव्यवस्था के तेजी से बढ़ने के बावजूद, हमारे आस-पास इतने युवा नौकरी की तलाश मे क्यों भटक रहे हैं ? यह रिपोर्ट भारत मे बेरोजगारी की गहराई, इसके पीछे के कारणों और संभावित समाधानों को उजागर करती है | आइए इस, जटिल विषय को सरल आंकड़ों और तथ्यों के माध्यम से समझें |

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प्रस्तावना: बेरोजगारी क्या है?

इस अनुभाग मे हम बेरोजगारी की बुनियादी परिभाषा और भारतीय संदर्भ में इसके मायने समझेंगे | यह खंड अपको आगे के तकनीकी आंकड़ों को समझे के लिए एक आधार प्रदान करेगा |

आसान शब्दों मे कहें तो बेरोजगारी वह स्थिति है जब कोई व्यक्ति काम करने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से सक्षम होता है, काम करने का इच्छुक भी होता है, लेकिन उसे रोजगार नहीं मिल पाता | भारत जैसे विशाल और युवा आबादी वाले देश मे, यह केवल एक आर्थिक समस्या नहीं है,बल्कि एक गहरी सामाजिक चुनौती भी है | हम अक्सर “डेमोग्राफीक डिविडेंट”(जनसांख्यिकी लाभांश) की बात करते है, लेकिन यदि इन हाथों को कम न मिले तो यह लाभांश एक आपदा मे बदल सकता है |

भारत मे बेरोजगारी के वर्तमान आंकड़े 

यह अनुभाग पिछले कुछ वर्षों मे भारत मे बेरोजगारी दर के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है | निचे दिए गए चार्ट के माध्यम से आप देख सकते हैं की “शहरी और ग्रामीण बेरोजगारी मे अंतर कैसा रहा है | चार्ट से आप सटीक आंकड़े जान सकते हैं | यह डेटा हमे बताता है की महामारी के बाद से रिकवरी की स्थिति क्या है|

Unemployment


नोट: ये आंकड़े विभिन्न राष्ट्रीय सर्वेक्षण और सीएमआईई (CMIE) रिपोर्ट के अनुमानित रुझानों पर आधारित हैं |

भारत मे बेरोजगारी के प्रमुख प्रकार 

बेरोजगारी केवल एक  प्रकार की नहीं होती है | अर्थशास्त्री इसे अलग-अलग श्रेणियों में बाटते हैं| इस सेक्शन मे, नीचे दिए गए ग्राफ को देखकर समझे और जानें कि भारत मे किस तरह की बेरोजगारी सबसे ज्यादा पाई जाती है |

संरचनात्मक बेरोजगारी (Structural Unemployment)

यह भारत की सबसे बड़ी समस्याओ मे से एक है | यह तब होती है जब बाजार मे उपलब्ध नौकरियों और श्रमिकों के कौशल के बीच कोई मेल नहीं होता| उदाहरण के लिए , उद्योगों को कोडिंग या मशीन लर्निंग जानने वाले लोगों की जरूरत हैं, लेकिन बाजार मे पारंपरिक डिग्री वाले युवा ज्यादा हैं| हमारी शिक्षा प्राणली और उद्धोग की मांग के बीच का यह अंतर ही संरचनात्मक बेरोजगारी को जन्म देता है|

शिक्षित बेरोजगारी (Educated Unemployment)

क्या आपने गौर किया है की आज कल कितने ग्रेजुएट और पोस्ट-ग्रेजुएट युवा छोटी नौकरियों के लिए आवेदन करते हैं? जब शिक्षित युवाओ को उनकी योग्यता के अनुसार काम नहीं मिलता, तो उसे शिक्षित बेरोजगारी कहते हैं | भारत मे यह समस्या बहुत आम है ,क्योंकि डेगरीयों के भरमार है लेकिन ‘एम्प्लॉयबिलिटी’ (रोजगार योग्यता) बहुत कम है।

प्रच्छन्न बेरोजगारी(Disguised Unemployment)

यह मुख्य रूप से भारत के कृषि क्षेत्र मे देखी जाती है | मान लीजिए के खेत मे काम करने के लिए 3 लोगों की जरूरत है, लेकिन पूरा परिवार यानि 6 लोग वहां काम कर रहे हैं | दिखने मे सभी रोजगार मे हैं, लेकिन बाकी 3 लोगों के काम का कुल उत्पादन पर कोई खास असर नहीं पड़ रहा | यदि उन्हे हटा भी दिया जाए तो पैदावार उतनी ही रहेगी | इसे छिपी हुई बेरोजगारी भी कहते हैं |

मौसमी बेरोजगारी (Seasonal Unemployment)

यह भी ज्यादातर गांवो और कृषि से जुड़ी है | किसान साल के कुछ खास महीनों (बुवाई और कटाई के समय ) मे ही व्यस्त रहते है | बाकी समय उनके पास कोई काम नहीं होता| इसी तरह पर्यटन या कुछ खास उद्धोगों मे भी साल के कुछ ही महीने काम होता है, इसे मौसमी बेरोजगारी कहते है|

घर्षण बेरोजगारी (Frictional Unemployment)

यह एक अस्थायी बेरोजगारी है | जब कोई व्यक्ति एक नौकरी छोड़कर दूसरी नौकरी की तलाश कर रहा होता है , तो बीच के समय मे वह बेरोजगार रहता है तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं मे यह सामान्य बात है और इसे बहुत चिंताजनक नहीं माना जाता है|

बेरोजगारी के मुख्य कारण क्या है ?

हम उन प्रमुख कारकों का विश्लेषण करेंगे जो भारत मे इस समस्या को बढ़ाते हैं | नीचे दिया गया डोनेट चार्ट विभन्न कारणों के अनुमानित प्रभाव को दर्शाता है | चार्ट से समझो

बढ़ती जनसंख्या का दवाब 25%

भारत की जनसंख्या जिस तेजी से बढ़ रही है उतनी तेजी से नौकरियां पैदा नहीं हो रही हैं हर साल लाखों नए युवा  श्रम मे शामिल होते है, जिससे संसाधनों और उपलब्ध नौकरियों पर भारी दवाब पड़ता है |

कौशल और शिक्षा व्यवस्था में कमी 35%

हमारी शिक्षा प्रणाली आज भी रटने ज्यादा ज़ोर देती है, प्रैक्टिकल ज्ञान या कौशल विकास पर नहीं | यही कारण है की कंपनियां कहती है की उन्हे योग्य उम्मीदवार नहीं मिल रहे , जबकि युवा कहते हैं की नौकरियां नहीं हैं |

कृषि क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता 15%

आज भी आधी से ज्यादा आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं, जबकि जीडीपी मे इसका योगदान बहुत कम है | कृषि से उद्धोग और सेवा क्षेत्र मे श्रमिकों का ट्रांसफर बहुत धीमी गति से हो रहा है|

धीमा औद्योगिक विकास 20%

मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (विनिर्माण क्षेत्र ) रोजगार पैदा करने का सबसे बड़ा साधन हो सकता है,लेकिन भारत मे इसकी वृद्धि दर चीन या अन्य विकासशील देशों के मुकाबले धीमी रही है |

बेरोजगारी के गंभीर परिणाम 

बेरोजगारी केवल एक व्यक्ति को नहीं बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र को प्रभावित करती है इस भाग मे हम इसके दो प्रमुख पहलुओ-आर्थिक अरु सामाजिक-पर  चर्चा करेंगे |

आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव 

मानव संसाधन की बर्बादी जो युवा देश की जीडीपी मे योगदान दे सकते थे, वे खाली बैठे हैं 
गरीबी मे बृद्धि रोजगार न होने से आय नहीं होती जिससे परिवारों का जीवन स्तर गिरता है 
सरकार पर बोझ सरकार को बेरोजगार को राहत देने और कल्याणकारी योजनाओ पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है 

सामाजिक समस्याए और मानसिक तनाव 

अपराध मे वृद्धि खाली दिमाग शैतान का घर होता है | रोजगार के अभाव मे युवा कई बार गलत रास्तों पर चले जाते हैं 
मानसिक स्वास्थ्य लंबे समय तक नौकरी न मिलने से डिप्रेशन, तनाव और आत्महत्या की दर मे वृद्धि होती है |
सामाजिक अशान्ति युवाओ मे असंतोष अक्सर विरोध प्रदर्शनों और सामाजिक अस्थिरता का कारण बनता है | 
Unemployment

सरकार द्वारा उठाए गए कदम और समाधान 

इस समस्या से निपटने के लिए सरकार ने समय-समय पर कई योजनाएं शुरू की हैं। क्या ये योजनाएं पर्याप्त हैं? आइए कुछ प्रमुख पहलों पर नजर डालें जो रोजगार सृजन को लक्ष्य बनती हैं |

मनरेगा (MGNREGA)

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम | यह मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों मे अकुशल श्रमिकों को साल मे कम से कम 100 दिन के रोजगार की गारंटी देता है |

स्किल इंडिया (Skill India)

युवाओ को उद्धोग-संबंधित कौशल प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए शुरू किया गया अभियान, ताकि संरचनात्मक बेरोजगारी को कम किया जा सके और उन्हे रोजगार योग्य बनाया जा सके|

मेक इन इंडिया (Make in India)

देश मे विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर) को बढ़ावा देने की पहल | इसका उद्देश्य विदेशी निवेश लाना और लाखों नई नौकरियां पैदा करना है|

निष्कर्ष: आगे के राह 

भारत मे बेरोजगारी (Unemployment in India ) एक बहुआयामी चुनौती है जिसका कोई एक रातों-रात समाधान नहीं हैं| सरकार की योजनाएं महत्वपूर्ण है, लेकिन सिर्फ उन पर निर्भर रहना काफी नहीं है| हमे अपनी शिक्षा प्रणाली मे आमूल-चूल परिवर्तन की जरूरत है जहाँ डिग्री से ज्यादा कौशल को महत्व दिया जाए | निजी क्षेत्र को भी आगे आकार प्रशिक्षण मे निवेश करना होगा | उद्दमिता (Entrepreneurship) को बढ़ावा देना होगा ताकि युवा नौकरी मांगने वाले नहीं, बलकि नौकरी देने वाले (Jobs Creators) बनें| अगर हम अपनी इस विशाल युवा ऊर्जा को सही दिशा दे पाए, तो भारत को एक वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने से कोई नहीं रोक सकता |

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

जनसंख्या वृद्धि दर कम होने से संसाधनों पर दबाव कम होगा, लेकिन यह एकमात्र समाधान नहीं है। हमें मौजूदा आबादी के कौशल विकास (Skill Development) और नए उद्योग स्थापित करने पर भी ध्यान देना होगा।

मनरेगा ने ग्रामीण क्षेत्रों में संकट के समय (जैसे कोविड-19 लॉकडाउन) में एक बड़ा सुरक्षा जाल प्रदान किया है। हालांकि, इसमें भ्रष्टाचार, देरी से भुगतान और स्थायी संपत्तियों के निर्माण न होने जैसी चुनौतियां भी शामिल हैं। यह एक अस्थायी राहत है, स्थायी रोजगार नहीं।

AI निश्चित रूप से कुछ रूटीन और डेटा-एंट्री जैसी नौकरियों को खत्म कर सकता है (संरचनात्मक बेरोजगारी बढ़ा सकता है), लेकिन साथ ही यह नई तरह की नौकरियां (प्रॉम्प्ट इंजीनियरिंग, AI एथिक्स आदि) भी पैदा करेगा। युवाओं को नई तकनीक के साथ खुद को अपग्रेड करना होगा।

युवाओं को केवल पारंपरिक डिग्री पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। उन्हें इंटर्नशिप करनी चाहिए, संचार कौशल (Communication Skills) सुधारने चाहिए और डिजिटल मार्केटिंग, कोडिंग, या डेटा एनालिसिस जैसे अतिरिक्त कोर्स (Vocational Skills) सीखने चाहिए जिनकी बाजार में मांग है।














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