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फ्रांसीसी क्रांति – एक युग का अंत और शुरुआत

फ्रांसीसी क्रांति क्या है?

फ्रांसीसी क्रांति क्या है?

क्या आपने कभी सोचा है की आज हम जिस “स्वतंत्रता”  और “ लोकतंत्र  “ की खुलकर बात करते है , उसके बीज कहा बोए गए थे ? दोस्तों , इसकी जड़े 18वी शताब्दी के फ़्रांस मे छुपी हैं | फ्रांसिसी क्रांति (1789-1799) कोई आम घटना नहीं थी; यह एक ऐसा भयानक लेकिन जरूरी तूफान था जिसने फ़्रांस के सदियों पुराने राजशाही (Monarchy) सिस्टम को उखाड़ फेंका | ज़रा सोचिए, एक ऐसा देश जहां का राजा खुद को भगवान का रूप मानता हो और आम जनता रोटी के एक एक टुकड़े के लिए मोहताज हो , वहाँ गुस्सा तो फूटेगा ही न ? इस क्रांति ने न सिर्फ राज्य लुई सोलहवे (Louis XVI) को गद्दी से उतारा, बलकि पूरी दुनिया को यह सिखाया की असली ताकत महलों मे नहीं बल्कि जनता के हाथों मे होती है |

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फ्रांसीसी क्रांति क्या है?

फ्रांसीसी क्रांति के प्रमुख कारण

कोई भी क्रांति रातों रातों नहीं होती | इसके पीछे सालों का गुस्सा और दर्द छुपा होता है | फ़्रांस की हालत उस समय एक ‘प्रेशर कुकर‘ जैसी हो गई थी , जिसकी सीटीं बजने ही वाली थी | आइए समझते है की आखिर इस कुकर मे क्या-क्या पक रहा था |

सामाजिक असमानता: तीन एस्टेट्स

सबसे बड़ी समस्या थी फ़्रांस का समाज | उस समय फ़्रांसीसी  समाज तीन हिस्सों (जिन्हे एस्टेट कहा जाता था ) मे बटा हुआ था | यह बंटवारा इतना गैर-बराबरी वाला था की सुनकर आपको भी गुस्सा आ जाएगा|

प्रथम एस्टेट: पादरी (Clergy)

इस एस्टेट मे चर्च के पादरी और उच्च अधिकारी आते थे | ये लोग कुल आबादी का मात्र 1% थे, लेकिन देश की लगभग 10% जमीन के मालिक थे | सबसे मजे की बात (या कहिए दुखद बात ) यह थी की इन्हे सरकार को कोई टैक्स नहीं देना पड़ता था ! उल्टा, ये किसानों से ‘टाइथ’ (Tithe) नाम का धार्मिक टैक्स वसूलते थे |

द्वितीय एस्टेट: कुलीन वर्ग (Nobility) 

यह था राजा के रिश्तेदार, जमींदारों और अमीरों का वर्ग | ये आबादी का मुश्किल से 2% थे , लेकिन 25% ज़मीन पर इनका कब्ज़ा था | प्रथम एस्टेट की तरह, इन्हे भी राज्य को कोई सीधा टैक्स नहीं देना पड़ता था | ये लोग आलीशान महलों मे रहते थे और आम जनता की मेहनत की कमाई पर ऐश करते थे |

तृतीय एस्टेट: आम जनता (Commoners)

अब बात करते है उनके, जिनके कंधों पर पूरे  देश का  बोझ  था | इस वर्ग मे किसान, मजदूर व्यापारी, वकील और गरीब लोग शामिल थे | ये कुल आबादी का 97% हिस्सा था | क्या आपको लगता है की इनके साथ न्याय होगा ? बिल्कुल नहीं ! देश का सारा टैक्स (टैक्स-डायरेक्ट टैक्स  और  अन्य इन-डायरेक्ट टैक्स ) सिर्फ यही एस्टेट चुकाता था | इनके पास न जमीन थी , न अधिकार, और न ही भरपेट खाना|

आर्थिक संकट और भारी कर्ज

फ़्रांस का खजाना खाली हो चुका था | क्यों? क्योंकि राज्य लुई सोलाहवें और उनकी पत्नी मैरी एंटोनेट की फिजूलखर्ची की कोई सीमा नहीं थी | इसके अलावा, फ़्रांस ने अमेरिका को ब्रिटेन से आजाद कराने के लिए युद्ध मे आर्थिक मदद की थी | इससे देश पर अरबों ‘लिव्रे’ (उस समय की मुद्रा ) का कर्ज हो गया |जब खजाना खाली हुआ , तो राज्य ने सोचा की चलो, तृतीय एस्टेट पर  टैक्स और बढ़ा देते है ! बस, यही वो चिंगारी थी जिसमे आग लगा दी|

दार्शनिकों और विचारकों का प्रभाव

जब पेट खाली होता है , तो दिमाग ज्यादा चलता है | उस दौर मे रूसो ((Rousseau), वोल्टेयर (Voltaire), और  मोंटेस्क्यू (Montesquieu) जैसे महान विचारको ने अपनी किताबों और भाषणों से जनता को जगाया | रूसो ने कहा “मनुष्य स्वतंत्र पैदा हुआ है , लेकिन हर जगह वह जंजीरों मे जकड़ा है |” इन विचारों ने पढे-लिखे मिडिल क्लास (जो तृतीय एस्टेट का हिस्सा थे ) के मन मे समानता और आजादी की बीज बो दिए|

क्रांति की समयरेखा (Timeline)

वर्ष /तिथि घटना विवरण 
मई 1789 एस्टेट जनरल की बैठकफ़्रांस के राजा लुई सोलहवाँ ने एस्टेट जनरल की बैठक बुलाई,जिसमें तृतीय एस्टेट (साधारण जनता) ने मतदान प्रणाली का विरोध किया। 
14 जुलाई 1789बास्तील का पतनपेरिस की जनता ने बास्तील किले पर हमला कर उसे तोड़ दिया यह घटना राजशाही के अंत की शुरुआत मानी जाती है।
अगस्त 1789मानधिकार की घोषणा “ मानव और नागरिक  की घोषणा” जारी हुई जिसमे स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के सिद्धांत स्थापित किए गए | 
जनवरी 1793 राजा की फांसी लुई सोलहवें को देशद्रोह के आरोप मे गिलोटिन द्वारा सार्वजनिक रूप से मृत्युदंड दिया गया।
1793-1794 आतंक का राज मैक्सिमिलियन रोबेस्पियरेके नेतृत्व में “Reign of Terror” चला, जिसमें हजारों लोगों को फांसी दी गई।
1799नेपोलियन का उदय नेपोलियन बोनापार्ट के सत्ता मे आने के साथ ही फ़्रांसीसी क्रांति का अंत हुआ |

क्रांति के प्रमुख चरण और घटनाएँ

अब प्रेशर कुकर फट चुका था | घटनाएं इतनी तेजी से घटीं कि किसी को संभलने का मौका नहीं मिल |

एस्टेट्स जनरल की बैठक (1789)

मई 1789 मे  टैक्स बढ़ाने के लिए राजा ने ‘एस्टेट जनरल ‘(एक प्रकार की संसद ) की बैठक बुलाई | नियम के अनुसार, हर एस्टेट का सिर्फ एक वोट होता था | इसका मतलब था की आमिर (पहला और दूसरा एस्टेट ) मिलकर हमेशा 2-1 जीत जाते थे | तृतीय एस्टेट ने इसका विरोध किया और मांग की की ‘हर व्यक्ति का एक वोट ‘ होना चाहिए | जब राजा ने यह बात नहीं मानी, तो तृतीय एस्टेट ने खुद को नेशनल असेंबली घोषित कर दिया|

बास्तील का ऐतिहासिक पतन

14 जुलाई 1789, यह तारीख इतिहास मे सुनहरे अक्षरों मे दर्ज है | पेरिस की आक्रोशित भीड़ ने ‘बास्तील के किले’ (Bastille) पर हमला कर दिया बास्तिल  राजा की तानाशाही का प्रतीक था और वहाँ राजनीतिक कैदियों को रखा जाता था| भीड़ ने किले को तहस-नहस कर दिया | यह घटना सिर्फ एक किले का टूटना नहीं था , यह फ़्रांस मे राजशाही के अहंकार का टूटना था| आज भी फ़्रांस मे 14 जुलाई को ‘बास्तील दिवस’ (Bastille Day) के रूप मे मनाया जाता है|

मानवाधिकारों और नागरिक अधिकारों की घोषणा

अगस्त 1789 मे नेशनल असेंबली ने “मानव और नागरिक अधिकारों की घोषणा “(Declaration of the Rights of Man) पारित की| यह दस्तावेज एक गेम-चेंजर था | इसमे स्पष्ट रूप से लिखा गया कि सभी इंसान जन्म से स्वतंत्र है और उनके अधिकार समान है| स्वतंत्रता, संपत्ति, सुरक्षा और शोषण के खिलाफ विरोध को इंसान का प्राकृतिक अधिकार माना गया|

आतंक का राज (Reign of Terror)

क्रांति हमेशा शांतिपूर्ण नहीं होती | 1793 से 1974 का दौर फ़्रांस के इतिहास का सबसे खौफनाक दौर था | इसे “आतंक का राज” कहा जाता है | जब राजा लुई सोलहवें पर देशद्रोह का मुकदमा चला और उसे फांसी (गिलोटीन ) दे दी गई , तो हालात और बेकाबू हो गए |

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रोबेस्पियरे और गिलोटिन का खौफ

इस समय सत्ता मैक्सिमिलियन रोबेस्पियरे (Maximilian Robespierre) और उसके जैकोबीन क्लब के हाथों मे आ गई| रोबेस्पियरे का मानना था कि क्रांति को बचाने के लिए कड़े कदम उठाने होंगे| उसने उस व्यक्ति को ‘गिलोटिन’ (सिर काटने वाली मशीन ) पर चढ़ा दिया जिस पर उसे क्रांति का दुश्मन होने का शक था| हजारों लोगों की हत्या की गई , जिसमे पूर्व रानी मैरी एंटोनेट भी शामिल थी| अंततः , जनता इस खौफ से परेशान हो गई और जुलाई 1794 मे खुद रोबेस्पियरे को ही गिलोटिन पर चढ़ा दिया गया|

क्रांति का अंत और नेपोलियन का उदय

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रोबेस्पियरे के पतन के बाद , एक कमजोर सरकार (Directory) ने सत्ता संभाली | देश मे अस्थिरता, भ्रष्टाचार और आर्थिक संकट अभी भी बना हुआ था| इसी उथल-पुथल का फायदा उठाया फ़्रांस के एक युवक और महत्वाकांक्षी सैन्य अधिकारी ने नेपोलियन बोनापार्ट (Napoleon Bonaparte)| 1799 मे उसने सत्ता पे कब्जा कर लिया और खुद को शासक घोषिक कर दिया| नेपोलियन के उदय के साथ ही फ़्रांसीसी क्रांति का तकनीकी रूप से अंत हो गया, लेकिन क्रांति के विचार कभी नहीं मरे|

फ्रांसीसी क्रांति का विश्व पर प्रभाव

फ्रांसीसी क्रांति का प्रभाव सिर्फ फ़्रांस तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ा | इस क्रांति का नारा “स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व” (Liberty, Equality, Fraternity) इतना शक्तिशाली था की इसने कई देशों की राजनीति और समाज को बदल दिया|

यूरोप के कई देशों मे लोगों ने राजशाही के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी और नई क्रांतियों की शुरुआत हुई| इसका असर भारत पर भी पड़ा यहाँ के नेता जैसे टीपू सुल्तान और राजा राममोहन राय भी इन विचारों से प्रेरित हुए| आज हम जो लोकतंत्र अधिकार और समानता की बात करते हैं, उसकी निव कही न कही इसी क्रांति से जुड़ी है| सरल  शब्दों मे कहे तो , फ़्रांसीसी क्रांति ने दुनिया को यह सिखाया की हर इंसान को बराबरी और आजादी का हक है|

निष्कर्ष

तो दोस्तों फ्रांसीसी क्रांति एक साधारन विद्रोह नहीं था; यह मानव इतिहास का एक ऐसा ‘टर्निंग पॉइंट’ था जिसने सामंतवाद (Feudalism) को नष्ट किया और आधुनिक राष्ट्रवाद और लोकतंत्र की निव रखी | बेशक, इसमे खून बहा और कई गलतियाँ भी हुई लेकिन इसने दुनिया को एक बहुत बड़ा सबक दिया : जब कोई शासक अपनी जनता की आवाज अनसुनी करता है और उनका शोषण करता है , तो जनता के सब्र का बांध एक न एक दिन जरूर टूटता है और जब वह टूटता है , तो बड़े बड़े सिंहासन ढह जाते हैं|

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बास्तिल पेरिस में एक किला और जेल थी, जिसे राजा की तानाशाही और अत्याचार का प्रतीक माना जाता था। 14 जुलाई 1789 को जनता द्वारा इसे तोड़ना यह साबित करता था कि राजा की निरंकुश सत्ता का अंत हो चुका है।

तृतीय एस्टेट में फ्रांस की 97% आम जनता शामिल थी। इसमें किसान, भूमिहीन मज़दूर, व्यापारी, शिल्पकार, और पढ़े-लिखे मध्य वर्ग के लोग (जैसे वकील और डॉक्टर) शामिल थे, जिन्हें भारी टैक्स देना पड़ता था।

‘आतंक का राज’ (1793-1794) मुख्य रूप से मैक्सिमिलियन रोबेस्पियरे द्वारा चलाया गया था। उसने ‘क्रांति के दुश्मनों’ को खत्म करने के नाम पर हज़ारों निर्दोष लोगों को गिलोटिन पर चढ़ाकर मौत की सज़ा दी थी।

क्रांति के कारण पैदा हुई राजनीतिक अस्थिरता और डायरेक्टरी शासन की विफलता का फायदा उठाकर 1799 में नेपोलियन बोनापार्ट ने सैन्य तख्तापलट किया और सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया, जिसे तकनीकी रूप से क्रांति का अंत माना जाता है।

 















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