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भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं salient features of the Indian Constitution

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं: एक संपूर्ण और रोचक मार्गदर्शिका

नमस्ते दोस्तों ! क्या आपने कभी सोचा है की हमारा देश भारत , जो विविधताओं का एक महासागर है – जहा हर सौ किलोमीटर पर भाषा , पहनावा  और खान-पान बदल जाता है – आखिर इतनी मजबूती से एक साथ कैसे बंधा हुआ है ? इसका सीधा और सटीक जवाब है हमारा संविधान। आज हम बात करने वाले हैं salient features of the Indian Constitution के बारे में।
अगर आप इंटरनेट पर “features of Indian constitution keyword use”  करके खोज रहे हैं  और  एक ऐसी जानकारी चाहते हैं जो किताबी ज्ञान से परे हो और जिसे समझना आसान हो , तो आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं | मैं आपको इस लेख मे बोरिंग कानूनी भाषा से बचाते हुए , बिल्कुल बातचीत के लहजें मे बताऊँगा की हमारे संविधान मे ऐसा क्या खास है जो इसे दुनिया का सबसे बेहतरीन संविधान बनाता है | तो चलिए , इस रोमांचक सफर की शुरुआत करते हैं ! 

Table of Contents

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प्रस्तावना: क्या है हमारे संविधान की आत्मा?

संविधान क्या है ? अगर मैं आसान शब्दों मे कहूं , यह हमारे देश का ’रुलबुक ‘ या’ ‘गाइड्बुक ‘ है जिस तरह किसी भी खेल को खेलने के लिए नियम चाहिए होते हैं वैसे ही 140 करोड़ लोगों के इस विशाल परिवार को चलाने के लिए कुछ नियमों की जरूरत थी| 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ हमारा संविधान महज कागजों का एक पुलिंदा नहीं हैं; य यह के जीवंत दस्तावेज है जो हमारी आकांक्षाओं, अधिकारों और कर्तव्यों को स्वर देता है |

डॉ बी आर अंबेडकर जी और प्रारूप समिति के अन्य महान सदस्यों ने दुनिया भर के संविधानों का गहन अध्ययन किया और हमारे लिए एक ऐसा ढाँचा तैयार किया जो हमारी जरूरतों के हिसाब से एकदम फिट बैठता है | तो चलिए , बिना देर किए,salient features of Indian constitution की गहराई में उतरते हैं।

भारतीय संविधान की 15 प्रमुख विशेषताएं

1. दुनिया का सबसे लंबा लिखित संविधान

जी हाँ, आपने बिल्कुल सही पढ़ा ! हमारा संविधान दुनिया का सबसे विशाल लिखित संविधान है | जब इसे 1949 मे अपनाया गया था, तब इसमे एक प्रस्तावना,395 अनुच्छेद (Article) थीं | आज के समय मे, संशोधनों के बाद , यह और भी बड़ा हो गया है कल्पना कीजिए, अमेरिका के संविधान मे सिर्फ 7 अनुच्छेद है , और हमारे मे 400 से भी ज्यादा ! यह आकड़ा ही इसकी विशालता को बयां करता है |

संविधान का विकास (1949 बनाम वर्तमान)

नीचे दिया गया चार्ट यह दर्शाता है कि समय के साथ हमारे संविधान के आकार में किस प्रकार वृद्धि हुई है।

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं

भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएं

आखिर यह इतना बड़ा क्यों है? इसके पीछे चार मुख्य कारण है:

  • भौगोलिक कारण : भारत का विशाल आकार और इसकी भारी विविधता|
  • ऐतिहासिक कारण :  भारत सरकार अधिनियम, 1935 का प्रभाव, जो खुद बहुत बड़ा था |
  • एकल संविधान : केंद्र और राज्यों दोनों के लिए एक ही संविधान (जम्मू और कश्मीर के अपवाद के अलावा, जो अब खत्म हो चुका है )|
  • कानूनी दिग्गजों का प्रभुत्व: संविधान सभा मे वकीलों की भरमार थी, जिन्होंने हर बात को पूरी कानूनी स्पष्टता के साथ लिखा |

2. विभिन्न स्रोतों से लिया गया (Drawn from various sources)

कई बार आलोचक कहते हैं की हमारा संविधान ‘उधार का थैला’ है | लेकिन डॉ अंबेडकर ने गर्व से कहा था की भारत का संविधान दुनिया के सभी ज्ञात संविधानों को “छानने ” के बाद बनाया गया है | हमने आँख बंद करके किसी की नकल नहीं की बल्कि जो अच्छी बातें हमारे देश के माहौल के हिसाब से सही लगीं, उन्हे अपने सांचे मे ढालकर अपना लिया |

उदाहरण के लिए मौलिक अधिकार अमेरिका से , नीति निर्देशक तत्व आयरलैंड से , और संसदीय प्रणाली ब्रिटेन से ली गई है | इसका ढांचागत हिस्सा काफी हद तक भारत सरकार अधिनियम 1935 से लिया गया है |

3. नम्यता और अनम्यता का अनूठा मिश्रण (Blend of rigidity and flexibility)

संविधान दो तरह के होते है: कठोर (Rigid) जैसे अमेरिका का, जिसे बदलना बहुत मुश्किल है; और लचीला (Flexible) जैसे ब्रिटेन का , जिसे आम कानून की तरह आसानी से बदला जा सकता है | हमारा संविधान न पूरी तरह से कठोर है न ही पूरी तरह लचीला | यह दोन का एक खूबसूरत मिश्रण है | अनुच्छेद 368 के तहत , कुछ संशोधनों के लिए विशेष बहुत (Special Majority ) की आवश्यकता होती है , जबकि कुछ अन्य को संसद के साधारण बहुमत से बदला जा सकता है | यह इसे समय के साथ बदलने की ताकत देता है |

4. एकात्मक झुकाव के साथ संघीय व्यवस्था (Federal system with unitary bias)

भारत का संविधान एक संघीय (Federal) सरकार की स्थापना करता है | इसमे  संघ के सभी सामान्य लक्षण मौजूद हैं – जैसे दो सरकारें (केंद्र और राज्य ), शक्तियों का बटवारा लिखित संविधान , और स्वतंत्र न्यायपालिका | लेकिन रुको ! इसमे एकात्मक (Unitary) या गैर-संघीय विशेषताएं भी भारी मात्रा मे हैं- जैसे एक मजबूत केंद्र,एकल संविधान , एकल नागरिकता, और अखिल भारतीय सेवाएं | के सी व्हेयर ने इसे “अर्थ -संघीय “(Quasi-Federal) कहा है | मतलब , सामान्य दिनों मे हम संघीय हैं, लेकिन संकट के समय मे पूरा देश एक मजबूत केंद्र के अधीन आ जाता है |

5. सरकार का संसदीय रूप (Parliamentary form of government)

हमने अमेरिकी “अध्यक्षीय प्रणाली” (Presidential System) के बजाय ब्रिटिश संसदीय प्रणाली (Parliamentary System) को क्यों चुना? क्योंकि हम इस प्रणाली से पहले से परिचित थे | इसमे विधायिका (Legislature) और कार्यपालिका (Executive) के बीच समन्वय और सहयोग होता है | इसमे वेस्टमिंस्टर मॉडल या प्रधानमंत्रीय सरकार भी कहा जाता है | इसमे राष्ट्रपति केवल नाममात्र का मुखिया होता है, जबकि वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली मंत्रिपरिषद के हाथों मे होती है |

6. संसदीय संप्रभुता और न्यायिक सर्वोच्चता का समन्वय

यह पॉइंट बहुत ही दिलचस्प features of Indian constitution मे से एक है | ब्रिटेन मे संसद सर्वोच्च है (संसदीय संप्रभुता ), जबकि अमेरिका मे सुप्रीम कोर्ट सर्वोच्च है ( न्यायिक सर्वोच्चता) भारत ने इन दोनों के बीच का बेहतरीन रास्ता निकाला है | हमारे यहां सुप्रीम कोर्ट अपनी न्यायिक समीक्षा (Judicial Review ) की शक्ति के तहत असंवैधानिक कानूनों को रद्द कर सकता है , तो दूसरी तरफ संसद अपनी “संविधान संशोधन “ शक्ति के माध्यम से संविधान के बड़े हिस्से मे बदलाव कर सकती है | है ना कमाल का  बैलेंस!

7. एकीकृत और स्वतंत्र न्यायपालिका (Integrated and independent judiciary)

अमेरिका मे केंद्र और राज्यों के लिए अलग-अलग अदालतें हैं | लेकिन हमारे भारत मे न्यायपालिका की एक ही एकीकृत प्रणाली (Integrated System) है | सबसे ऊपर सुप्रीम कोर्ट है, उसके नीचे राज्यों में हाई कोर्ट हैं, और फिर निचली अदालतें | इसके साथ ही हमारा संविधान न्यायपालिका की स्वतंत्रता की पूरी गारंटी देता है | जजों का कार्यकाल सुरक्षित है और उनके वेतन संचित निधि पर भारित होते हैं, ताकि वे बिना किसी दर या दवाब के न्याय कर सकें |

8. मौलिक अधिकार: नागरिकों का ढाल (Fundamental Rights)

संविधान का भाग III भारतीय नागरिकों को 6 मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है | ये अधिकार हमारे विकास के लिए अत्यंत आवश्यक हैं  और राज्य की तानाशाही को रोकते हैं | ये अधिकार “ न्यायोजित “(Justiciable) हैं, जिसका अर्थ है की अगर आपके अधिकारों का हनन होता है , तो आप सीधे अदालतों (सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट ) का दरवाजा खटखटा सकते हैं | क्या यह आपको एक शक्तिशाली नागरिक नहीं बनाता ?

9. राज्य के नीति निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy)

डॉ बी आर अंबेडकर के अनुसार , ये संविधान की “ अनूठी विशेषता “ हैं | भाग IV मे उल्लेखित ये तत्व राज्य (सरकार ) के लिए निर्देश हैं | की नीतियां बनाते समय उन्हे किन बातों का ध्यान रखना चाहिए | इनका उद्देश्य देश मे सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र (Social and Economic Democracy) की स्थापना करना है , ताकि एक ‘कल्याणकारी राज्य ‘(Welfare State) बने सके | हालंकी , मौलिक अधिकारों के विपरीत , इन्हे अदालतों द्वारा लागू नहीं किया जा सकता |

10. मौलिक कर्तव्य (Fundamental Duties)

मूल संविधान मे नागरिकों के कर्तव्यों का कोई जिक्र नहीं था | इन्हे बाद मे 1976 मे 42वें  संशोधन अधिनियम (स्वर्ण सिंह समिति की सिफारिश पर ) द्वारा जोड़ा गया | भाग IV-A मे 11 मौलिक कर्तव्य शामिल हैं | ये हमें याद दिलाते हैं की यदि हम अधिकारों का आनंद लेते हैं , तो हमारे देश, समाज और साथी नागरिकों के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य भी हैं , जैसे राष्ट्रगान का सम्मान करना, भाईचारा बढ़ाना आदि |

11. धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State)

भारत का संविधान एक धर्मनिरपेक्ष राज्य (Secular State) की वकालत करता है | इसका मतलब यह नहीं है कि भारत धर्म-विरोधी ; इसका मतलब यह है की राज्य का अपना कोई आधिकारिक धर्म नहीं है | राज्य सभी धर्मों को समान सम्मान देता है और सभी को समान रूप से रक्षा करता है | “धर्मनिरपेक्ष “ शब्द को 1976 मे 42वें संशोधन के माध्यम से प्रस्तावना मे जोड़ा गया था |

12. सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार (Universal Adult Franchise)

जब भारत आजाद हुआ , तो देश मे साक्षरता बहुत कम थी और गरीबी बहुत ज्यादा | ऐसे मे संविधान निर्माताओ ने एक बहुत ही साहसिक कदम उठाया | उन्होंने हर उस नागरिक को ,जिसकी उम्र 18 वर्ष (मूल रूप से 21 वर्ष , जिसे 1989 मे 61वें संशोधन द्वारा घटाकर 18 कर दिया गया ) है , बिना किसी जाती, धर्म , लिंग या संपत्ति के भेदभाव के वोट देने का अधिकार दिया | इसने लोकतंत्र को सही मायनों मे जनता तक पहुचाय |

13. एकल नागरिकता (Single Citizenship)

अमेरिका जैसे देशों मे दोहरी नागरिकता होती है ( एक देश की और एक राज्य की )| लेकिन भारत मे , हालांकि व्यवस्था संघीय है, नागरिकता केवल एक ही है , भारतीय नागरिकता | चाहे आप पंजाब मे पैदा हुए हों या केरल में , आपके पास पूरे देश मे समान राजनीतिक और नागरिक अधिकार हैं | इसका उद्देश्य भाईचारे को बढ़ावा देना और देश की एकता को बनाए रखना है |

14. आपातकालीन प्रावधान (Emergency Provisions)

सोचीय, अगर देश पर अचानक कोई बड़ा संकट आ जाए तो क्या होगा ? एसी असाधारण स्थितियों (जैसे युद्ध ,बाहरी आक्रमण , या वित्तीय संकट ) से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए राष्ट्रपति को विशेष शक्तियां दी गई है |

पूरी तरह से केंद्र के नियंत्रण मे आ जाते हैं | यह बिना किसी औपचारिक संशोधन के संघीय ढांचे को एकात्मक मे बदल देता है |

15. त्रि-स्तरीय सरकार (Three-tier Government)

शुरुआत मे हमारा संविधान केवल दो स्तरीय था ( केंद्र और राज्य )| लेकिन 1992 मे 73वें और 74वें संशोधन ने एक ऐतिहासिक बदलाव किया |

इन्होंने ‘स्थानीय स्वशासन ‘(Local Self -Government) को संवैधानिक मान्यता दी | अब हमारे पास पंचायतों (गावों के लिए ) और नगर पालिकाओं (शहर के लिए ) के रूप मे सरकार का तीसरा स्तर है , जो दुनिया को किसी भी अन्य संविधान मे नहीं पाया जाता है |

निष्कर्ष 

संक्षेप मे कहे तो , salient features of Indian constitution इसे दुनिया का सबसे अनोखा और व्यापक दस्तावेज बनाते हैं | यह न तो बहुत कठोर है की इसमे बदलाव न किया जा सकते , और न ही इतना लचीला की कोई भी इसके साथ खिलवाड़ कर सके | यह हमारे देश के लोकतांत्रिक ढांचे की रीढ़ है | यह केवल एक कानूनी किताब नहीं है; यह एक सामाजिक अनुबंध है जो एक बेहतर , न्यायपूर्ण और समतावादी समाज बनाने के लिए हम सबी कोएक साथ बांधता है | जैसे-जैसे  हमारा समाज विकसित हो रहा है , वैसे-वैसे हमारा संविधान भी संशोधनों और न्यायिक व्याख्याओं  के माध्यम से बढ़ और निखर रहा है | आशा ही की अब आपको “features of Indian constitution keyword use”  करते समय न केवल समझ  आई होगी बल्कि इसे पढ़ने मे मज़ा भी आया होगा !

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

संविधान सभा को इस ऐतिहासिक दस्तावेज को पूरा करने में कुल 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन का समय लगा। इस दौरान उन्होंने लगभग 60 देशों के संविधानों का अध्ययन किया।

इसे ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसके कई प्रावधान अन्य देशों के संविधानों से प्रेरित हैं (जैसे अमेरिका से मौलिक अधिकार, ब्रिटेन से संसदीय प्रणाली)। हालांकि, यह आलोचना पूरी तरह सही नहीं है, क्योंकि हमने इन प्रावधानों को जस का तस नहीं अपनाया, बल्कि भारत की परिस्थितियों के अनुकूल ढालकर शामिल किया।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने ‘संवैधानिक उपचारों के अधिकार’ (अनुच्छेद 32) को संविधान का हृदय और आत्मा कहा था। वैसे आम तौर पर, संविधान की ‘प्रस्तावना’ (Preamble) को भी इसकी आत्मा और दर्शन का सार माना जाता है।

जी हां, बिल्कुल! अनुच्छेद 368 के तहत संसद संविधान में संशोधन कर सकती है। यह समय की जरूरतों के अनुसार बदल सकता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट के ‘बुनियादी ढांचे’ (Basic Structure) के सिद्धांत के अनुसार, संसद संविधान के मूल स्वरूप को नष्ट या बदल नहीं सकती है।


















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