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भारत मे गरीबी का सम्पूर्ण विश्लेषण

Poverty in India

परिचय:

क्या आपने कभी सोचा है कि जिस देश की अर्थव्यवस्था दुनिया की पाँचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है , वहां आज भी करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी के लिए क्यों मोहताज है ? जब हम ऊंची इमारतों और चमचमाते मॉल्स को देखते हैं , तो अकसर हमारे शहरों के उन अंधेरे कोनों को भूल जाते है जहां गरीबी आज भी अपनी जड़े जमाए हुए है | आईए,एक इंसान के नज़रिय से इस गहरी चुनौती को समझने की कोशिश करते है|

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भारत में गरीबी :एक गहरी चुनौती, क्या हम इसे हरा पाएंगे ?

दोस्तों , जब हम भारत की बात करते है तो हमारे दिमाग म दो अलग-अलग तस्वीरें उभरती है | एक तरफ वो इंडिया है जो चांद पर मंगलायान भेज रहा है , डिजिटल पेमेंट्स मे दुनिया को पछाड़ रहा हा और जहां स्टार्टअप को बाढ़ आई हुई है | लेकिन वही दूसरी तरफ ,एक वो भारत है जो आज भी साफ पानी, बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओ और पेट भर खाने के लिए संघर्ष कर रहा है | यह विरोधाभास हमें झकझोर देता है | हम चांद तक पहुच गए , लेकिन क्या हम अपने ही देश के उस आखिरी इंसान तक पहुंच पाए हैं जिसे हमारी सबसे ज्यादा जरूरत हैं ?

यह सिर्फ आंकड़ों को खेल नहीं है | हर एक आंकड़े के पीछे एक ऐसा चेहरा है जो रात को भूखे सोता है | एक ऐसा पिता है जो अपने बीमार बच्चे के लिए दवा नहीं ला पाता , एक ऐसी माँ है जो अपने हिस्से का खाना बच्चों को खिला देती है | गरीबी कोई बीमारी नहीं है ,बल्कि यह एक ऐसी सामाजिक खामी है जिसे हमने और हमारी व्यवस्थाओ ने जाने-अनजाने मे पनपने दिया हैं |

गरीबी आखिर है क्या ?

गरीबी को सिर्फ पैसों की कमी से तौलने बहुत बड़ी भूल होगी | सच कहूँ तो गरीबी अवसरों की कमी का नाम है | यह वो स्थिति है जहां एक इंसान अपनी बुनियादी जरूरतों- जैसे भोजन , कपड़े ,मकान ,शिक्षा और स्वास्थ्य – को पूरा करने में असमर्थ होता है जब कोई व्यक्ति समाज की मुख्यधारा से कट जाता है और अपनी क्षमताओ का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर पात, तो वह गरीब है |

एक अदृश्य जाल 

कल्पना कीजिय एक मकड़ी के जाले की | जो कीड़ा उसमे एक बार फस जाता है , उसका बाहर निकलना लगभग नामुमकिन हो जाता है | गरीबी भी बिल्कुल ऐसा ही अदृश्य जाल है |एक गरीब परिवार मे पैदा हुआ बच्चा , कुपोषण का शिकार होता है | कमजोर स्वास्थ्य के कारण वह ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाता | शिक्षा के अभाव मे उसे अच्छी नौकरी नहीं मिलती, और फिर वह काम करने को मजबूर हो जाता है | नतीजा ? उसेक बच्चे भी उसी जाल मे फंस जाते हैं | इसे हम ‘गरीबी की दुष्चक्र’ (Vicious cycle poverty) कहते हैं |

भारत मे गरीबी (poverty in India) के मुख्य कारण

अब सवाल उठता है कि आखिर यह समस्या इतनी गहरी क्यों है ? इसके पीछे कोई एक कारण नहीं है, बल्कि कई एतिहासिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों का एक मिला-जुला रूप है | आइय इसके मुख्य पहलुओ पर नजर डालते हैं |

बढ़ती आबादी का बोझ 

हम दुनिया के सबसे ज्यादा आबादी वाले देश बन चुके हैं | इतनी बड़ी आबादी का सीधा मतलब है संसाधनों पर अत्यधिक दबाव | जब खाने वाले हाथ ज्यादा हों और कमाने वाले हाथ कम , तो गरीबी का आना स्वाभाविक है | जनसंख्या वृद्धि दर भले ही कम हुई हो, लेकिन कुल आबादी का आकार इतना बड़ा है की रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकार के प्रयास अक्सर नाकाफी साबित होते हैं |

शिक्षा और कौशल की कमी 

कहते हैं की शिक्षा वो हथियार है जो दुनिया बदल सकता है | लेकिन हमारे देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा आज भी एक बड़ा मुद्दा है | स्कूल तो खुल गए हैं , लेकिन क्या वहां सच मे वो पढ़ाई हो रही है जो एक बच्चे को भविष्य के लिए तैयार कर सके ?

क्या डिग्रीयां काफी हैं ?

आज हमारे पास लाखों ऐसे  युवा हैं जिनके हाथों मे डिग्रियां तो हैं, लेकिन कौशल (Skills) नहीं | इंडस्ट्री को जो हुनर चाहिए , वो हमारे शिक्षा ढांचे से गायब है | इस स्किल गैप ‘ के कारण एक बहुत बड़ा युवा वर्ग या तो बेरोजगार है या ‘अंडर-एंप्लॉयड’ (अपनी क्षमता से कम दर्जे का काम करने को मजबूर ) हैं | जब अच्छी आय ही नहीं होगी,तो गरीबी कैसे दूर होगी ?

कृषि पर अत्यधिक निर्भरता

आज भी भारत की लगभग आधी आबादी अपनी आजीविका के लिए सीधे तौर पर कृषि पर निर्भर है | लेकिन हमारी जीडीपी (GDP) मे कृषि का योगदान 20% से भी कम है | इसका क्या मतलब हैं ? इसका सीधा अर्थ है की खेती मे जरूरत से जायद लोग लगे हुए हैं, जिसे छिपी हुई बेरोजगारी ‘ कहते हैं | ऊपर स मौसम की अनिश्चतता, सूखे, बाढ़ और फसलों के उचित दाम न मिलने के कारण किसान लगातार कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा हैं |

शहरों बनाम गांवो की गरीबी 

गरीबी का चेहरा और गांव मे अलग-अलग होता है | गांव मे गरीबी का मतलब अक्सर जमीन न होना, खेती बर्बाद होना और बुनियादी सुविधाओ का अभाव होता है | लेकिन शहरों की गरीबी का रूप और भी भयावह हैं |

Poverty in India

पलायन का दर्द 

रोजगार की तलाश मे गांव का इंसान शहर की तरफ भागता हैं | उसे लगता है की शहर मे उसकी किस्मत चमक जाएगी | लेकिन हकीकत कुछ और ही होती है | शहर मे उसे दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चलाने या कन्स्ट्रक्शन साइट पर काम करने के अलावा कुछ खास नहीं मिलता | महंगाई इतनी ज्यादा होती है की वह जो कमाता है , वो बस जिंदा रहने मे खर्च हो जाता हैं|

झोंपड़पट्टियों की जिंदगी 

क्या आपने कभी मुंबई की धारावी या दिल्ली की झुग्गियों को करीब से देखा है ? एक छोटे से कमरे मे 8-10 लोग रहते हैं | न साफ पानी, न हवा , न सीवर | यह शहरी गरीबी का सबसे कड़वा सच है | गांव से आया इंसान गरीबी से भागकर शहर तो आता है , लेकिन यहां आकर वह एक नई और बदतर गरीबी मे फंस जाता है |

गरीबी के आँकड़े क्या कहते हैं ?

यह जानना बहुत जरूरी है की आकड़ों मे हम कहा खड़े हैं | हालंकी पिछले कुछ दशकों मे भारत ने लाखों लोगों को गरबी रेखा से बाहर निकाला है, लेकिन चुनौती अभी भी विशाल है|

भारत मे गरीबी

नीति आयोग की रिपोर्ट का सच 

हाल ही मे नीति आयोग ने बहुआयामी गरीबी सूचकांक (Multidimensional Poverty Index – MPI) की रिपोर्ट जारी की है | इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत मे पिछले कुछ वर्षों मे उल्लेखनीय सुधार हुआ है | लगभग 24.82 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए हैं | यह एक बहुत ही सकारात्मक खबर है | लेकिन हमे यह नहीं भूलना चाहिए की आज भी देश मे एक बड़ा वर्ग गरीबी मे जी रहा है | बिहार,झारखंड, उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों मे आज भी गरीबी का स्तर चिंताजनक रूप से ऊंचा है|

गरीबी का समाज पर प्रभाव 

गरीबी कोई अकेली बीमारी नहीं ; यह अपने साथ कई बीमारियां लेकर आती है | इसका असर सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि पूरे समाज और देश के भविष्य पर पड़ता है |

कुपोषण : बचपन छीनता अभिशाप 

गरीबी का सबसे सीधा असर बच्चों पर पड़ता है | उन्हे भरपेट और पौष्टिक खाना नहीं मिल पाता | ग्लोबल हंगर इंडेक्स (Global Hunger Index) मे भारत की रैंकिंग अक्सर हमे सोचने पर मजबूर करती है | कुपोषित बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होता है, जो आगे चलकर देश की तरक्की मे अपना योगदान नहीं दे पाता |

महिलाओ पर दोहरी मार 

गरीब परिवारों मे अक्सर महिलाओं और बच्चियों की स्थति सबसे खराब होती है | अगर घर मे खाना कम है तो पहले पुरुषों को खिलाया जाता है | अगर पढ़ाई के लिए पैसे कम है तो लड़कों को स्कूल भेजा जाता है | इसे पितृसत्तात्मक सोच के कारण महिलाएं गरीबी की दोहरी मार झेलती हैं |

अपराध और सामाजिक अस्थिरता 

भूख इंसान से कुछ भी करवा सकती है | जब एक युवा को नौकरी नहीं मिलती और परिवार भूखा होता हैं , तो उसके गलत रास्ते पर जाने की संभावना बढ़ जाती है | गरीबी अपराधों का जन्मदाता नहीं तो कम से कम एक बड़ा उत्प्रेरक जरूर है | इससे समाज मे अस्थिरता और आक्रोश फैलता हैं |

सरकार के कदम: क्या नीतियां काम कर रही हैं ?

ऐसा नहीं है की सरकारें हाथ धरे बैठी हैं | आजादी के बाद से ही “ गरीबी हटाओ “ जैसे नारे गूंजते रहे है | कई योजनाएं भी बनी हैं, जिनका फायदा भी हुआ है |

मनरेगा (MGNREGA): एक जीवन रेखा

महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ने ग्रामीण भारत मे एक बड़ी भूमिका निभाई है | यह साल मे 100 दिन के रोजगार की गारंटी देता है | सूखे या महामारी (जैसे कोविद-19) के समय मे मनरेगा ने करोड़ों परिवारों के लिए एक जीवनरेखा का कम किया और उन्हे भुखमरी से बचाया |

जन धन योजना और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण 

प्रधानमंत्री जन धन योजना ने हर गरीब के बैंकिंग सिस्टम स जोड़ा | इसका सबसे बड़ा फायदा “ डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर (DBT) के रूप मे मिला | अब गैस की सब्सिडी हो , पेंशन हो या किसान सम्मान निधि, पैसा सीधा लाभार्थी के खाते में पहुंचता है |

क्या भ्रष्टाचार कम हुआ ?

पहले एक प्रधानमंत्री ने कहा था कि “मैं दिल्ली से 1 रुपया भेजता हूं तो गांव तक सिर्फ 15 पैसे पहुचते है | “DBT तकनीकी ने बीच के बिचौलियों को खत्म करके इस लीकेज को काफी हद तक रोका है | यह गरीबी उन्मूलन मे तकनीकी का एक शानदार उपयोग है |

आगे का रास्ता: हम क्या कर सकते हैं ?

योजनाए अपनी जगह हैं लेकिन गरीबी को पूरी तरह से मिटाने के लिए हमे कुछ बुनियादी बदलाव करने होंगे |

शिक्षा मे क्रांति की जरूरत 

हमे अपनी शिक्षा प्रणाली को रटने से हटाकर “स्किल्स” (कौशल) पर लाना होगा | व्यावसायिक प्रशिक्षण (Vocational training) पर ज़ोर देना होगा ताकि एक युवा जब स्कूल से निकले, तो उसके हाथों मे कोई ऐसा हुनर हो जिससे वह अपना पेट पाल सके|

रोजगार सृजन और स्टार्टअप्स 

सरकार सबको सरकारी नौकरी नहीं दे सकती | इसलिए हमे छोटे मँझोले उद्धोगों (MSMEs) को बढ़ावा देना होगा, क्योंकि सबसे ज्यादा रोजगार यही पैदा करते है | गांवो मे ही ऐसी उद्धोग लगाने होंगे ताकि लोगों को शहरों की तरह पलायन न करना पड़े | एग्री-स्टार्टअप्स खेती को मुनाफे का सौदा बना सकता हैं |

निष्कर्ष 

हां, मनरेगा ने ग्रामीण क्षेत्रों में अत्यधिक गरीबी और भुखमरी को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह कृषि के खाली मौसम में रोजगार की गारंटी देता है, जिससे मजदूरों के हाथ में नकद पैसा आता है। हालांकि, यह गरीबी का स्थायी समाधान नहीं है, लेकिन यह एक बहुत मजबूत ‘सुरक्षा जाल’ (Safety net) जरूर है।

बहुआयामी गरीबी  का मतलब है की इंसान सिर्फ पैसों से गरीब नहीं हैं , बल्कि वह कई मोर्चों पर वंचित है इसमे यह देखा जाता है की क्या व्यक्ति कुपोषित है ? क्या बच्चे स्कूल जा रहे हैं? क्या घर में पक्की छत, बिजली , पीने का साफ पानी और शौचालय हैं? यदि इनमे से कई चीजों की कमी है, तो व्यक्ति बहुआयामी रूप से गरीब माना जाता है |

नीति आयोग की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, बिहार, झारखंड, मेघालय, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश उन राज्यों में गिने जाते हैं जहां बहुआयामी गरीबी का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत से अधिक है। हालांकि, इन राज्यों में सुधार भी काफी तेजी से हो रहा है।

हम कई तरह से योगदान दे सकते हैं। पहला, अपने आसपास काम करने वाले लोगों (मेड, ड्राइवर, मजदूर) को उचित वेतन दें। दूसरा, वंचित बच्चों की शिक्षा को स्पॉन्सर करें। तीसरा, कौशल विकास में मदद करें या स्थानीय छोटे व्यवसायों (Local businesses) से सामान खरीदें ताकि उनके पास पैसा पहुंचे।

अंत मे, यही कानून चाहूँगा किभारत मे गरीबी  (Poverty In India) कोई ऐसा पहाड़ नहीं है जिसे तोड़ा ना जा सके| हमने पोलियो को हराया हैं, हम अंतरिक्ष मे झंडे गाड़ रहे है, तो गरीबी को भी हरा सकते हैं| जरूरत है सिर्फ सही दिशा मे निरंतर प्रयास की | सरकार,प्राइवेट सेक्टर और हम आम नागरिकों को मिलकर काम करना होगा| जब तक देश की आखिरी गरीब व्यक्ति सशक्त होकर सम्मान की ज़िंदगी नहीं जीने लगता, तब तक हमारी तरक्की की  कोई भी कहानी अधूरी ही रहेगी| आइए करें कि वो दिन जल्द आए जब “गरीब” शब्द सिर्फ इतिहास की किताबों मे सिमट कर रह जाए |

अक्सर पूछे जाने वाले प्रशन 











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