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मनरेगा(MGNREGA): भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा

मनरेगा(MGNREGA)

मनरेगा: भारत के ग्रामीण विकास की संजीवनी

क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे देश के उन सुदूर गांवों मे क्या होता है , जहां बारिश न होने पर खेतों के कोई काम नहीं बचता? जब फसल कट जाती है और अगली बुवाई में महीनों का समय होता है, तो एक गरीब मजदूर का चूल्हा कैसे जलता है? दोस्त , यही पर एंट्री होती है के ऐसी योजना की जिसने ग्रामीण भारत की तस्वीर को काफी हद तक बदल कर रख दिया है |

Table of Contents

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हम बात कर रहे है मनरेगा (MGNREGA) की | यह सिर्फ एक सरकारी योजना नहीं हैं; यह लाखों-करोड़ों परिवारों के लिए उम्मीद की एक किरण हैं, एक ऐसी संजीवनी है जो मुश्किल वक्त मे उनकी सांसे टूटने नहीं देती| आइए, आज बिल्कुल आसान और बोलचाल की भाषा मे इस योजना का पूरा पोस्टमार्टम करते हैं और समझते है कि यह जमीन पर कितना कारगर है |

1. मनरेगा क्या है? एक सरल परिचय

सीधे शब्दों मे कहूं तो, मनरेगा भारत सरकार का एक ऐसा कानून है जो गांव के हर उस परिवार को साल भर मे कम से कम 100 दिन के रोजगार की पक्की गारंटी देता है, जिसके वयस्क सदस्य स्वेच्छा से अकुशल (Unskilled) शारीरिक श्रम चाहते हैं| इसका मतलब है की अगर आप गांव मे रहते है , आपके पास को खास स्किल या डिग्री नहीं है, और आप मेहनत-मजदूरी करने को तैयार है, तो सरकार आपको काम देने के लिए कानून रूप से बाध्य है | है ना कमाल की बात?

1.1 इतिहास के पन्नों से: नरेगा से मनरेगा तक का सफर

रोम एक दिन मे नहीं बना था और न ही मनरेगा| इसकी शुरुआत 2005 मे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (NREGA) के रूप मे हुई थी| यह दुनिया के सबसे बड़े सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों मे से एक के रूप मे लॉन्च किया गया था | बाद मे, 2 अक्टूबर पर, इसके नाम मे ‘महात्मा गांधी’ जोड़ दिया गया और यह बन गया ‘मनरेगा’| बापू का सपना था की भारत के गांव आत्मनिर्भर बने, और यह योजना उसी सपने को सच करने की दिशा मे एक बहुत बड़ा कदम है|

2. यह योजना काम कैसे करती है?

अब आप सोच रहे होंगे की भाई यह सब सुनने मे तो बहुत अच्छा लग रहा है ,लेकिन असल ज़िंदगी मे यह काम कैसे करता है ? क्या किसी दफ्तर के चक्कर काटने पड़ते हैं? चलिए इस गुत्थी को सुलझाते है | इसका पूरा कंट्रोल ग्राम पंचायत के हाथ मे होता है| यानि फैसला गांव की संसद (पंचायत) करती है , दिल्ली या मुंबई मे बैठे बाबू नहीं|

2.1 जॉब कार्ड: आपकी रोजगार की चाबी

जैसे बैंक से पैसा निकालने के लिए ATM कार्ड चाहिए , वैसे ही मनरेगा मे काम पाने के लिए जॉब कार्ड ‘ की जरूरत होती है यह एक पासबुक जैसा होता है जिसमे परिवार के उन सभी सदस्यों की फ़ोटो और डिटेल होती है जो काम करना चाहता हैं | इसमे यह भी दर्ज होता है की आपने कितने दिन काम किया और आपको कितनी मजदूरी मिली|

2.1.1 जॉब कार्ड के लिए आवेदन कैसे करें?

प्रक्रिया एकदम सीधी है | गांव का कोई भी व्यक्ति ग्राम पंचायत मे जाकर मौखिक या लिखित रूप से आवेदन कर सकता है | पंचायत आपकी जांच करेगी (की आप उसी गांव के निवासी है या नहीं ) और 15 दिन के अंदर आपको एक जॉब कार्ड बनाकर दे देगी| यह पूरी तरह से मुफ़्त होता है| अगर 15 दिन मे काम नहीं मिलता है, तो सरकार आपको बेरोजगार भत्ता देने के लिए मजबूर है ! सोचिए , कानून ने आम आदमी को कितनी ताकत दी है|

जॉब्स कार्ड के लिए मुख्य विशेषताए 

विवरण  नियम / प्रावधान 
जारी करने की अवधि  आवेदन के 15 दिनों के भीतर |
लागत  लाभार्थी के लिए पूर्णतः निशुल्क 
विवरण  परिवार के सदस्यों की फ़ोटो बैंक खाता और काम का रिकार्ड 
वैधता  समान्यतः 5 वर्ष 

2.2 100 दिन का गारंटी रोजगार: सच्चाई या मिथक?

कानून तो 100 दिन का पक्का वादा करता है, लेकिन क्या असल मे ऐसा होता हैं ? सच कहूं तो यह एक मिल-जुला अनुभव रहा है| कुछ राज्यों मे परिवार पूरे 100 दिन काम कर लेते है, लेकिन राष्ट्रीय औसत अक्सर 45-50 दिन के आसपास ही रहता है क्यों? क्योंकि कई बार पंचायतों के पास काम के प्रोजेक्ट मंजूर नहीं होते,या फिर ऊपर से फंड आने मे देरी हो जाती है| फिर भी, अकाल या महामारी (जैसे कोरोना) के समय यही 50 दिन का काम भी डूबते को तिनके का सहारा बन जाता है|

3. ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर मनरेगा का प्रभाव

मनरेगा ने सिर्फ गड्ढे खोदने का काम नहीं किया है इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था के पूरे पहिये को घुमा दिया है| जब एक गरीब के हाथ मे पैसा आता है, तो वह उसे स्विस बैंक मे नहीं रखता; वह गांव की दुकान से साबुन,तेल ,राशन खरीदता है| इससे स्थानीय बाजार मे मांग बढ़ती है और अर्थव्यवस्था मे जान आती है|

मनरेगा

3.1 गरीबी हटाओ: सिर्फ नारा या हकीकत?

कई अर्थशास्त्रियों का मानना है की मनरेगा ने ग्रामीण भारत मे भुखमरी को काफी हद तक काम किया है | यह पलायन (Migration) रोकने मे भी एक बड़ा हथियार साबित हुआ है | पहले लोग काम की तलाश मे शहरों की ओर भागते थे, गंदी बस्तियों मे रहने को मजबूर होते थे | अब, कम से कम साल के कुछ महीने उन्हे अपने ही गांव, अपने परिवार के बीच कम मिल जाता है | क्या यह अपने आप मे एक बड़ी उपलब्धि नहीं है?

4. महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा हथियार

अगर आप मुझसे पूछें कि मनरेगा की सबसे बड़ी सफलता क्या है, तो मैं कहूँगा – महिलाओ की भागीदारी| हमारे समाज मे जहां महिलाओ को अक्सर घर की चारदीवारी तक सीमित माना जाता था , वहां मनरेगा ने उनके हाथ मे फावड़ा और पासबुक थमा दी है|

4.1 महिलाओं के लिए 33% आरक्षण

कानून मे साफ लिखा है कि मनरेगा के तहत जितने भी लोगों को काम मिलेगा, उनमे से कम से कम एक-तिहाई (33%) महिलाएं होनी चाहिए | लेकिन हकीकत मे, राष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं की भागीदारी 50% से भी ऊपर है! दक्षिणी राज्यों मे तो यह आकड़ा 80% तक पहुच जाता है | जब औरतें खुद कमाती है, तो घर मे उनकी इज्जत बढ़ती है और वे अपने बच्चों की पढ़ाई और सेहत पर बेहतर खर्च कर पाती हैं|

4.1.1 कार्यस्थल पर महिलाओं के लिए सुविधाएं

इतना ही नहीं, कानून यह भी सुनिश्चित करता है कि जहां काम चल रहा है, वहां पिने का साफ पानी, आराम करने के लिए शेड,और अगर 5 से ज्यादा बच्चे हैं तो उनकी देखभाल के लिए एक “आया“(क्रेच की सुविधा) मौजूद हो | हालांकि जमीनी स्तर पर इन सुविधाओ मे कमी देखने को मिलती है, लेकिन प्रावधान अपने आप मे बहुत प्रगतिशील है|

मनरेगा

महिलाओं की भागीदारी के आकड़ें 

  • 2013-14 मे : 48%
  • 2024-25 मे : 58.15%

कुल महिला श्रमिक : लगभग 440.7 लाख

5. पर्यावरण और जल संरक्षण में योगदान

लोग अक्सर ताना मारते है की मनरेगा मतलब सिर्फ “गड्ढे खोदना और भरना”| लेकिन यह सच्चाई से कोसों दूर है | मनरेगा के तहत ज्यादातर काम पर्यावरण को सुधारने वाले होते हैं|

5.1 सूखे से निपटना: तालाब और नहर निर्माण

जल संरक्षण (water Conservation) मनरेगा का सबसे पसंदीदा काम है | सूखे तलबों को गहरा करना, चेक डैम बनाना, नहरों की सफाई, और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण करना | इन कामों से न सिर्फ लोगों को मजदूरी मिलती है,बल्कि गांव का भूजल स्तर (Groundwater level) भी बढ़ता है, जिससे बाद मे खेती मे मदद मिलती है| एक तीर से दो शिकार!

मनरेगा

6. मनरेगा की राह में आने वाली बाधाएं और चुनौतियां

हर सिक्के के दो पहलू होते हैं| मनरेगा कोई जादुई छड़ी नहीं, और इसमे भी कोई खामियां और चुनौतीयां हैं जिन पर खुलकर बात करनी जरूरी हैं|

6.1 फंड का रोना: मजदूरी मिलने में देरी

यह मनरेगा की सबसे बड़ी और दर्दनाक समस्या है| कानून कहता है की काम खत्म होने की 15 दिन के भीतर मजदूरी मिल जानी चाहिए| लेकिन कई बार केंद्र सरकार से राज्यों को फंड मिलने मे महीनों लग जाते है सोचिए जिस गरीब ने अपना पसीना बहाया है, अगर उसे 2 महीने तक पैसे न मिले तो उसके घर का खर्च कैसे चलेगा? यह देरी योजना की पूरी भावना को ही मार देती है|

6.2 भ्रष्टाचार का दीमक: फर्जी जॉब कार्ड

जहां पैसा है, वहां भ्रष्टाचार की गुंजाइश बन ही जाती है | सरपंच और बिचौलियों की मिलीभगत से फर्जी जॉब कार्ड बन जाना, मरे हुए लोगों के नाम पर पैसे निकालना, या मशीनों (जैसे-JCB) से काम करवाकर उसे मजदूरों के नाम पर दिखा देना – ये कुछ ऐसी बीमारियां हैं जो मनरेगा को अंदर ही अंदर खोखला कर रही हैं|

7. तकनीक ने कैसे बदली तस्वीर?

इन बीमारियों का इलाज करने के लिए सरकार ने टेक्नोलॉजी रूपी वैक्सीन का इस्तेमाल शुरू किया हैं | और सच कहूं तो, इसके काफी अच्छे नतीजे भी देखने को मिल रहे हैं|

7.1.1 आधार लिंकिंग और डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT)

अब सरपंच या ठेकेदार मजदूरों को कैश पैसे नहीं बाटते | हर जॉब कार्ड को व्यक्ति के आधार कार्ड और बैंक खाते से लिंक कर दिया गया है| दिल्ली से पैसा निकलता है और सीधा मजदूर के बैंक खाते (DBT) मे पहुचता है | इससे बीच की बिचौलियों की छुट्टी हो गई और फर्जीवाड़ा काफी हद तक कम हुआ है|

7.1.2 काम की जियो-टैगिंग

पहले लोग कागज पर तालाब बना देते थे और पैसे हजम कर जाते थे | अब सरकार ने ‘भुवन’(Bhuvan) ऐप के जरिए जियो-टैगिंग(Geo-tagging) अनिवार्य कर दी है | जो भी तालाब या सड़क मनरेगा के तहत बनेगी उसकी सैटलाइट के साथ फ़ोटो अपलोड करनी पड़ती हैं| बिना सबूत के पेमेंट नहीं ! इससे कागजी कामों पर लगाम लगी है|

 8.वित्तीय विश्लेषण: बजट 2025-26 और राज्यों की भूमिका

मनरेगा की सफलता इसमे वित्तीय पोषण पर निर्भर करती है | केंद्र सरकार अकुशल श्रम लागत का 100% और सामग्री व प्रशानिक लागत का 75% वहन करती है|

8.1. बजट 2025-26 के मुख्य आंकड़े 

मद  विवरण (FY2025-26)
कुल बजट आवंटन  86,000 करोड़ रुपये 
निधि जारी (जुलाई 2025 तक ) 45,783 करोड़ रुपये 
मजदूरी भुगतान के लिए जारी  372,912 करोड़ रुपये 
मजदूरी दर संशोधन  CPI-AL के आधार पर प्रतिवर्ष संशोधित 

9. निष्कर्ष: क्या मनरेगा भविष्य की जरूरत है?

तो आखिर में हम किस नतीजे पर पहुँचते हैं? क्या मनरेगा को बंद कर देना चाहिए? बिल्कुल नहीं ! कोविद-19 महामारी के दौरान जब लाखों मजदूर शहरों से खाली हाथ अपने गांवो की तरफ लौटे थे , तब यही मनरेगा था जिसने उन्हे भुखमरी से बचाया था| यह एक ढाल हैं, कोई तलवार नहीं जो रातों-रात सारी गरीबी काट देगी|

 हमे जरूरत है इसकी खामियों को दूर करने की | सरकार को फंड समय पर जारी करना होगा, मजदूरी की दरों को महंगाई के हिसाब से बढ़ाना होगा , और सामाजिक ऑडिट (Social Audit ) को और सख्त बनाना होगा ताकि भ्रष्टाचार रुके| जैसे पेड़ को बढ़ने के लिए लगातार पानी और खाद की जरूरत होती है,वैसे ही ग्रामीण भारत के इस सबसे बड़े सुरक्षा जाल को राजनीतिक इच्छाशक्ति और सही क्रियान्वयन की जरूरत है | जब तक भारत क गावों मे गरीबी और बेरोजगारी है, तब तक मनरेगा की प्रासंगिकता बनी रहेगी|

अक्सर पूछे जाने वाला प्रशन

जी हाँ  यदि आपने काम के लिए आवेदन किया है और 15 दिनों के भीतर ग्राम पंचायत आपको काम उपलबद्ध नहीं  कराती है , तो आप बेरोजगारी भत्ता पाने के हकदार है यह राज्य सरकार की जिम्मेदारी है की वह आपको भत्ता दे |

नहीं मनरेगा लिंग आधारित भेदभाव को पूरी तरह प्रतिबंधित करता है पुरुष और महिला दोनों को समान कार्य के लिए समान मजदूरी (Equal Wage) दी जाती है |वस्ताव मे मनरेगा मे महिलाओ की भागीदारी 58% से अधिक है |

APBS एक ऐसी प्रणाली है जिसके तहत आपकी मजदूरी सीधे आपके उस बैंक खाते मे जमा होती है जो आधार से लिंक है यह भुगतान मे होने वाली देरी को कम करने, बिचौलियों को हटाने और यह सुनिश्चित करने के लिए है कि पैसा सही व्यक्ति के खाते में पहुंचे |

 VB-G RAM G(विकसित भारत ग्रामीण रोजगार गारंटी) मनरेगा का एक उन्नत संस्करण है, जिसमे काम की गारंटी हो 100 दिनों से बढ़ाकर 125 दिनों कर दिया गया है इसमे खेती के मौसम के दौरान 60 दिनों का ‘कृषि विराम’ भी दिया गया है ताकि खेती के काम पर असर न पड़े| 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 



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