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भारत मे आरक्षण प्रणाली (Reservation System in India)

Reservation System in India

Reservation System in India:एक विस्तृत मार्गदर्शिका

भारत मे आरक्षण (Reservation) शब्द सुनते ही लोगों के कान खड़े हो जाते है | कुछ लोग इसे समजीक न्याय का हथियार मानते है तो कुछ इसे योग्यता का दुश्मन | लेकिन क्या अपने कभी सोचा है की यह व्यवस्था वास्तव मे क्या है ? क्यों इसे लागू किया गया और आज के समय में इसकी क्या प्रासंगिकता है? चलिए , आज इस पेचीदा विषय की परतों को खोलते है और इसे एक नए नजरिए से देखते है |

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आरक्षण क्या है ?

भारत मे आरक्षण (India Reservation) व्यवस्था का उद्देश्य समाज के उन वर्गों को आगे बढ़ाना है जिन्हे एतिहासिक रूप से शिक्षा , नौकारिया और अवसरों से वंचित रखा गया था | इस नीति ने पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जाती , अन्य पिछड़े वर्ग आदि ) और महिलाओ को सरकारी नौकरियों और शिक्षण सनास्थानों मे अलग से सीटें और पद दिए यह केवल नौकरी या कॉलेज तक नहीं है बल्कि समाज मे बराबरी का एक जरिया है|

आरक्षण का इतिहास : यह कहाँ से शुरू हुआ ?

कई लोग सोचते है की आरक्षण आजादी के बाद शुरू हुई है,लेकिन इसकी जड़े काफी पुरानी है| 1902 मे कोल्हापूर के छत्रपती शहू जी महराज ने पहले स्थान पर पिछड़े जातियों को राज्य मे नौकरियों का आरक्षण दिया | स्वतंत्रता के बाद संविधान मे SC/ST के लिए 15% और 7.5 % आरक्षण की व्यवस्था की गई|

डॉ अंबेडकर और पूना पैक्ट का महत्व

1932 मे जब ब्रिटिश सरकार ने कम्यूनल अवॉर्ड के जरिए दलितों को अलग अलग निर्वाचन क्षेत्र देने की बात की , तो गांधी जी इसके खिलाफ अनशन पर बैठ गए | अंत मे डॉ बी आर  अंबेडकर और गांधी जी के बीच पूना पैक्ट हुआ | यही से दलित वर्गों के लिए सीटों के आरक्षण की नींव पड़ी , जिसे बाद मे भारतीय संविधान मे जगह मिली |

स्वतंत्रता-पूर्व आरक्षण का विकाशक्रम 

वर्ष प्रमुख घटना / नीति महत्व एव प्रभाव 
1882हंटर आयोग ज्योतिराव फुले द्वारा दलित प्रतिनिधित्व की पहली मांग 
1901शाहू महाराज का आदेश कोल्हापूर रियासत मे पिछड़ो के लिए 50% आरक्षण 
1909मिंटो-मोर्ले सुधारधर्म आधारित पृथक निर्वाचन की शुरुआत 
1919भारत सरकार अधिनियम सांप्रदायिक प्रतिनिधत्व का विस्तार 
1932सांप्रदायिक  पंचाट दलितों के लिए अलग निर्वाचन का प्रस्ताव 
1932पुणे पैक्ट संयुक्त हिन्दू निर्वाचन मण्डल के भीतर सीटों का आरक्षण 
1935भारत सरकार अधिनियम अनुसूचित जातियों और जनजातियों की कानूनी परिभाषा 

भारतीय संविधान और आरक्षण प्रावधान 

आरक्षण के प्रावधान कई आधारों पर है : जातिगत (SC/ST/OBC), लिंग (महिलाओं के लिए ), आर्थिक (EWS 10%), राज्य / निवास (देश के अलग-अलग राज्यों मे स्थानीय लोगों के लिए ),धर्म आधारित आदि | इसकी वजह से तमिलनाडु मे 69 % तक आरक्षण है , जबकि केन्द्र सरकार मे OBC को 27% SC को 15% ST को 7.5% और EWS को 10% आरक्षण मिला हुआ है |

अनुच्छेद 15 और 16: समानता का अधिकार

अनुच्छेद 15 कहता है की धर्म ,जाती या लिंग के आधार पर  भेद-भाव नहीं होगा| लेकिन अनुच्छेद 15(4) सरकार को पिछड़ो के लिए विशेष नियम बनाने की शक्ति देता है | वही अनुच्छेद 16(4) सरकारी नौकरियों मे उन वर्गों को आरक्षण देने की बात करता है|

Reservation System in India

आरक्षण के विभन्न प्रकार 

आज भारत मे आरक्षण कई श्रेणियों मे बटा हुआ है | इसे समझना बहुत जरूरी है क्योंकि यह केवल जाती तक सीमित नहीं रहा |

जाती आधारित आरक्षण (ST/SC/OBC)

ये हमारे देश के आरक्षण सिस्टम का सबसे पुराना और मुख्य हिस्सा है इसे आप बराबरी की शुरुआत कह सकते है | मोटे तौर पर इसका गणित कुछ ऐसा है:

  • अनुसूचित जाती (SC): इनके लिए 15% सीटें तय की गई |
  • अनुसूचित जनजाति (ST): इनके लिए 7.5% का कोटा रखा गया |
  • अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC): इन्हे 27% आरक्षण मिलता है |

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण

2019 मे भाजपा सरकार ने 103वां संविधान साँसोधन करके EWS आरक्षण लागू किया | इसके तहत सामान्य वर्ग उन लोगों को 10% आरक्षण मिलता है जिनकी पारिवारिक आय कम है| यह एक बड़ा बदलाव था क्योंकि पहली बार आरक्षण का आधार “आर्थिक ” बनाया गया|

लिंग आधारित आरक्षण:

महिलाओ की भागीदारी बढ़ाने के लिए पंचायतों और स्थानीय निकायों मे एक-तिहाई या उससे अधिक आरक्षण होता है | केंद्र या राज्य सरकारे भी कई बार नौकरियों और शिक्षण संस्थानों मे महिलाओ के लिए विशेष सीटें रखते है|

धार्मिक / आदिवासी आधारित :

कुछ राज्यों ने धार्मिक या क्षेत्रीय अल्पसंख्यकों को आरक्षण दिया , लेकिन यह विवाद है संविधान ने खास तौर पर धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया है (Article 15)

प्रबंध कोटा (Management quota )

निजी कॉलेज और कुछ सरकारी कॉलेज मे कुल सीटों का एक हिस्सा प्रबंधन कोटा के रूप मे अलग होता है | इन सीटों पर एडमिशन अक्सर अधिक फीस या donation पर होते है | यह प्रशासनिक व्यवस्था है , शैक्षणिक आरक्षण का हिस्सा नहीं |

उच्च शिक्षा / कॉलेज कोटा :

आईआईटी मेडिकल कॉलेज , सरकारी विश्वविद्यालयों मे कैटेगरी-वार सीटें होती है | केन्द्रीय कानूनों के तहत  SC/ST/OBC/EWS को अलग अलग प्रतिशत मिलते है | उदाहरण के लिए केन्द्रीय विश्वविद्यालयों मे SC 15%, ST 7.5%, OBC 27%, EWS 10% आरक्षण रहता है।

Reservation System in India

मण्डल आयोग क्या है ?

1979 मे पिछड़े वर्गों की पहचान के लिए मण्डल आयोग बना | जिसमे 1980 के OBC को   27% आरक्षण मिला | आयोग ने विभन्न सामाजिक एवं आर्थिक मानदंडों से 1,257 अन्य पिछड़े वर्गों की पहचान की | 1990 मे वीपी सिंह सरकार ने इन सिफ़रोशों को लागू किया | इस फैसले से देशभर मे बड़े विरोध-प्रदशन हुए | बाद मे सुप्रीम कोर्ट ने 1992 मे इसका समर्थन करते हुए कुल आरक्षण को 50% तक सीमित किया |

मलाईदार परत (Creamy Layer)

मलाईदार परत का मतलब है पिछड़े वर्गों मे से वो परिवार जो आर्थिक सामाजिक रूप से मजबूत है उन्हे सुप्रीम कोर्ट (इंद्रा सहवनी ,1992) ने निर्णय दिया की ऐसे लोगों को आरक्षण से बाहर रहा जाएगा | सरकार ने बाद मे आय सीमा तय की अगर किसी की वार्षिक आय 8 लाख हो उसे आरक्षण से बाहर रखा जाए ताकि बहुत अमिर OBC इसका लाभ न ले सके। इसका उद्देश्य है कि आरक्षण का लाभ वास्तव में वंचित और जरूरतमंद तक पहुँचे।

राज्यवार आरक्षण (State-wise variations)

भारत के राज्य अपनी सामाजिक आवश्यकतानुसार आरक्षण तय करते है | सबसे खास उदाहरण है तमिलनाडु जहा 1990 के दशक से 69% तक आरक्षण है | मद्रास उच्च न्यायालय और संविधान के नौवें अनुसूची में शामिल कर इसे कानूनी संरक्षण मिला उदाहरण के लिए तमिलनाडु मे पिछड़ा वर्ग (BC+MBC+BC मुसलमान) को ~50% ,अनुसूचित जाती 18%, अनुसूचित जनजाति 1% दिया गया , जिससे कुल 69 % होता है |

राजस्थान ने पिछड़ो (EBC) और महिलाओं को बढ़ावा देने के लिए उच्च कोटा की योजना बनाई , जिसमे कुल 67-68% तक आरक्षण प्रस्तावित है , जिसमे सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए भी जगह है |
महाराष्ट्र  ने मराठा समुदाय के लिए अतिरिक्त 13% आरक्षण जोड़ा  गया है |
अन्य राज्यों मे भी विविध कोटा है : केरल कर्नाटक , ओडिशा आदि मे OBC/SC/ST के साथ आर्थिक औ अन्य श्रेणियों के लिए  प्रावधान है |

भारत मे आरक्षण से जुड़े प्रमुख कानूनी फैसले 

  • इंद्रा सहवनी बनाम भारत संघ (1992) सुप्रीम कोर्ट ने तय किया की आरक्षण की सीमा 50% से अधिक नहीं होगी | साथ ही मलाईदार परत को आरक्षण से बाहर रखने का नियम लागू किया गया |
  • संविधान का 77वां  साँसोधन (1995) अनुच्छेद 16(4A) जोड़ा गया जिससे SC/ST को  प्रोन्नति(Promotion) मे आरक्षण का अधिकार मिल | बाद मे 85वां संशोधन (2001) से इसमे वरिष्ठता (Seniority) की व्यवस्था भी जोड़ी गई 
  •  संविधान का 93वां संशोधन (2005) आरक्षण को सरकारी सहायता प्राप्त निजी कॉलेजों तक बढ़ाया गया | यानि कुछ प्राइवेट शिक्षण संस्थानों मे भी आरक्षण लागू हुआ |
  • एम. नागराज बनाम भारत संघ (2006) सुप्रीम कोर्ट ने प्रोन्नति में आरक्षण को स्वीकार किया, लेकिन शर्त रखी कि पिछड़े वर्गों की आर्थिक/शैक्षणिक स्थिति का आंकलन किया जाए और कुल आरक्षण 50% से अधिक न हो|
  • संविधान का 103वाँ संशोधन (2019) एवं 2022 फैसला
    आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS – General Category) को 10% आरक्षण दिया गया।
    सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में इसे वैध ठहराया और कहा कि EWS कोटा पर 50% सीमा लागू नहीं होगी

आरक्षण पर पक्ष और विपक्ष बहसे 

Reservation System in India

समर्थकों का तर्क 

  • आरक्षण सामाजिक न्याय का साधन है |
  • पिछड़ी और दलित जातियों सदियों से शोषित रही है , उनके पास शिक्षा और अवसरों की कमी थी |
  • आरक्षण ने उन्हे शिक्षा और रोजगार मे प्रवेश दिलाया और मुख्यधारा से जोड़ा |
  • संविधान निर्माताओं ने भी विशेष प्रावधानों को मंजूरी दी ताकि समान अवसर मिल सके |
  • जब तक सभी को समान शुरुआत नहीं मिलेगी तब तक प्रतिस्पर्धा मे असली संत संभव नहीं |

विरोधियों का तर्क 

  • आरक्षण से मेरिट और योग्यता प्रभावित होती है |
  • लंबे समय ये यह समाज मे विभाजन को गहरा कर सकता है |
  • आरक्षण जाती के बजाय गरीबी और क्षमता के आधार पर होनी चाहिए |
  • कुछ आमिर पिछड़े वर्ग भी लाभ उठा लेते है , जबकि असली जरुरतमन्द पीछे रह जाते है |
  • सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा की आरक्षण पर सीमा (50%) होनी चाहिए , तक मूल संवैधानिक अधिकार प्रभावित न हो |

वर्तमान आरक्षण प्रतिशत

केंद्र सरकार (central Government)

SC15%
ST7.5%
OBC27%
EWS10%
कुल मिलाकर लगभग 59.5% आरक्षण 

राज्यों के उदाहरण 

  • तमिलनाडु -कुल 69%
  • BC+MBC+BCM~ 50%+
  • SC – 18%
  • ST –  1%
  • राजस्थान – सामाजिक एवं आर्थिक पिछड़े वर्गों के लिए 67-68% तक प्रस्तावित 
  • महाराष्ट्र  – मराठा आरक्षण जुडने से कुल 63% +
  • उत्तर प्रदेश कर्नाटक आदि  – OBC~ 27% + SC/ST मिलाकर कुल लगभग 50%

आरक्षण के उद्देश्य: आखिर इसकी जरूरत क्यों है?

ऐतिहासिक अन्याय को सुधारना

सदियों तक छुआछूत और भेदभाव झेलने वाले समाज को बराबरी का अधिकार देना मुख्य लक्ष्य है|

प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना 

प्रशासन और सत्ता में हर वर्ग की भागीदारी होनी चाहिए ताकि नीतियां सबके लिए बनें।

आरक्षण के फायदे और चुनौतियाँ

आरक्षण ने लाखों लोगों को गरीबी से निकाला है और उन्हे सम्मान दिया है | लेकिन इसकी अपनी चुनौतियां भी है | कई बार योग्यता (Merit ) बनाम कोटा की बहस छिड़ जाती है | क्या कम अंक वाले को सीट मिलना सही है ? यह यह एक ऐसा सवाल है जिनका कोई एक सीधा जवाब नहीं है |  चुनौतियां यह भी है की आरक्षण का लाभ अक्सर उसी वर्ग के सम्पन्न लोग ले जाते है जबकि असली हकदार पीछे रह जाते है |

क्या आरक्षण को खत्म कर देना चाहिए 

यह एक संवेधनशील सवाल है| सच्चाई यह है की जब तक समाज मे जातिगत भेदभाव मौजूद है, तब तक आरक्षण को पूरी तरह खत्म करना मुश्किल है |हाँ, इसमें समय के साथ सुधार (Reforms) की जरूरत है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि लाभ सबसे निचले पायदान पर बैठे व्यक्ति तक पहुँचे।

निष्कर्ष 

अंत में, हमें एक ऐसे भारत की ओर बढ़ना है जहाँ किसी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म से नहीं, बल्कि उसकी मेहनत और काबिलियत से हो। Reservation System in India उसी दिशा में एक जरूरी कदम है, लेकिन इसके साथ-साथ शिक्षा, जागरूकता और अवसरों की समान उपलब्धता पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

हाँ, EWS आने के बाद कुल आरक्षण 50% से अधिक हो गया है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने वैध माना है।

हाल ही में संसद ने महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का बिल पास किया है, जो आने वाले समय में लागू होगा।

हाँ, वर्तमान में यह मुख्य रूप से सरकारी संस्थानों और सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों में लागू है।

हा  स्थानीय तहसील या जिला प्रशासन द्वारा जांच के बाद जारी किया जाता है।














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