परिचय :
भारतीय राजनीति मे हमे अक्सर सुनने को मिलता होगा जिसमे विधायक एक पार्टी से जीतकर दूसरी पार्टी मे शामिल हो जाता जिससे से सरकार मे अस्थिरता बढ़ती है और सरकार गिर जाती है ऐसे ही घटनाओ को रोकने के लिए भारतीय संविधान मे दसवीं अनुसूची (10th Schedule) जोड़ी गई | इसे ही आम तौर पर दल-बदल कानून (Anti Defection Law) कहते है |
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!इस कानून को लाने का मुख्य उद्देश्य यही है चुने हुए प्रतिनिधि बिना किसी ठोस कारण के अपनी पार्टी न बदले और लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थिरता बनी रहे। तो हम इस ब्लॉग मे दसवीं अनुसूची के बारे मे अच्छे से जानेंगे
दसवीं अनुसूची क्या है ?
दसवीं अनुसूची भारतीय संविधान का वह हिस्सा है जिसमे यह बताया गया है की अगर कोई सांसद या विधायक अपनी पार्टी छोड़ देता है या पार्टी के आदेश के खिलाफ वोट करता है , तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है |
इसक मतलब यह है की इस कानून को दल-बदल कानून (Anti Defection Law) को रोकने के लिए के लिए बनाया गया था |
यह कानून मे 52वें संविधान संविधान के जरिए लागू किया गया था|
यह कानून क्यों बनाया गया ?
भारत मे 1960 और 1970 के दशक मे कई नेताओ ने बार-बार पार्टी बदली| इससे सरकारे गिरने लगी और राजनीतिक अस्थिरता बढ़ गई |
1967 के समय एक घटना बहुत चर्चित हुई “आया राम गया राम ” कहा गया | एक विधायक ने बहुत कम समय मे कई बार कई पार्टी बदल ली थी |
इस तरह के घटनाओ को रोकने के लिए सरकार ने दल-बदल विरोधी कानून बनाया |
कब कोई विधायक या सांसद अयोग्य हो सकता है ?
दसवीं अनुसूची के अनुसार किसी भी सांसद या विधायक को अयोग्य घोषित किया जा सकता है अगर वह
- अपनी पार्टी की सदस्यता खुद से छोड़ देता है
- अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट करता है
- पार्टी के निर्देश के बावजूद वोटिंग मे शामिल नहीं होता
हालांकि अगर पार्टी 15 दिनों के अंदर उस सदस्य को माफ कर दे, तो उसकी सदस्यता बच सकती है|
पार्टी के विलिय की स्थिति
कभी-कभी ऐसा भी हॉट है की एक राजनीतिक दल किसी दूसरे दल मे मिल जाता है ऐसी स्थिति मे दसवीं अनुसूची अलग नियम बताती है |
अगर किसी दल के कम से कम दो तिहाई सदस्य किसी दूसरे दल मे जाने का फैसला करते है , तो इसे विलय (Merger) माना जाता है और उन सदस्यों को अयोग्य नहीं ठहराया जाता |
अयोग्यता का फैसला कौन करता है ?
अगर किसी सांसद या विधायक पर दल-बदल का आरोप लगता है, तो इसका फैसला संबंधित सदन का अध्यक्ष (Speaker) या सभापति (Chairman) करता है
उदाहरण के लिए
- लोकसभा मे फैसला स्पीकर करते है |
- राज्यसभा मे फैसला सभापति करते है |
- राज्य विधानसभा मे फैसला स्पीकर करते है
उनका फैसला महत्वपूर्ण माना जाता है |
2003 मे क्या बदलाव हुआ ?
शुरुआत मे इस कानून मे एक नियम था की अगर कोई दल के एक-तिहाई सदस्य अलग होकर नया दल बना लेते है,उन्हे अयोग्य नहीं माना जाएगा|
लेकिन इस नियम का बहुत ज्यादा दुरुपयोग होने लगा |
इसलिए 2003 मे 91वें संविधान संशोधन के जरिए इस नियम को हटा दिया गया | अब केवल दो-तिहाई सदस्यों के विलय की स्थिति मे ही छूट मिलती है
सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसले
दसवीं अनुसूची से जुड़े कई मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने भी फैसला दिया है |
केहोतो होलोहन मामला (1992)
इस मामले मे सुप्रीम कोर्ट ने कहा की Anti Defection Law पूरी तरह वैध है और यह संविधान के खिलाफ नहीं है |
केइशम मेघाचंद्र सिंह मामला (2020)
इस मामले मे सुप्रीम कोर्ट ने कहा की स्पीकर को दल बदल से जुड़े मामलों का फैसल ज्यादा देर तक लंबित नहीं रखना चाहिए |
कोर्ट ने सुझाव दिया की ऐसे मामलों का फैसला लगभग तीन महीने के अंदर होना चाहिए |
इन कानून के फायदे
दसवीं अनुसूची लागू होने के बाद कुछ सकारात्मक बदलाव देखने को मिले |
- सरकारों की स्थिरता बढ़ी
- बार-बार पार्टी बदलने की घटनाएँ कम हुई
- राजनीतिक दलों मे अनुशासन बढ़ा
इस कानून की आलोचना
हालांकि कुछ लोग इस कानून की आलोचना भी करते है |
उनका कहना है की इससे सांसद और विधायक अपनी स्वतंत्र राय के अनुसार मतदान नहीं कर पाते | उन्हे अपनी पार्टी के निर्देश का पालन करना ही पड़ता है |
कुछ विशेषज्ञ यह भी सुझाव देते है की दल-बदल के मामलों का फैसला स्पीकर के बजाय किसी स्वतंत्र संस्था को करना चाहिए |
निष्कर्ष:
भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची भारतीय लोकतंत्र मे बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है यह कानून दल-बदल की समस्या को कम करने और राजनीतिक व्यवस्था को स्थिर बनाए रखने के लिए बनाया गया है |
हालंकी इसमे कुछ कमियाँ भी हैं लेकिन समय-समय पर संशोधन और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों ने इसे और मजबूत बनाने की कोशिश की है
भविष्य मे संभव है की इस कानून मे और सुधार किए जाए ताकि लोकतंत्र और ज्यादा मजबूत बन सके |
FAQ (Frequently Asked Questions)
10th Schedule of the Indian Constitution किस संशोधन से जोड़ा गया था?
भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से जोड़ी गई थी।
Anti-Defection Law क्या है?
Anti-Defection Law वह कानून है जो सांसदों और विधायकों को बिना कारण पार्टी बदलने से रोकता है। इसे संविधान की 10वीं अनुसूची में शामिल किया गया है।
10th Schedule का मुख्य उद्देश्य क्या है?
10वीं अनुसूची का मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल-बदल को रोकना और सरकार में स्थिरता बनाए रखना है।
क्या सुप्रीम कोर्ट 10वीं अनुसूची से जुड़े मामलों की समीक्षा कर सकता है?
हाँ, सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट स्पीकर के फैसले की न्यायिक समीक्षा कर सकते हैं।