प्रस्तावना
बंगाल विभाजन (1905) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक ऐसी घटना है जिसने राष्ट्रवाद की ज्वाला को प्रचंड रूप से धक्का दिया | यह घटना ब्रिटिश सम्राज्यवाद की क्रूर ‘फुट डालो और राज करो की नीति काएक सुनियोजित षड्यन्त्र थी, जिसका मुख्य उद्देश्य हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच दरार पैदा करना तथा बंगाल में उभरते राष्ट्रवादी आंदोलन को कुचलना था | यद्यपि यह विभाजन मात्र छह वर्ष ही चल पाया और 1911 में इसे रद्द कर दिया गया, किन्तु इसके दूरगामी परिणाम हुए जिन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के राजनीतिक भविष्य को अपरिवर्तनीय रूप से बदलकर रख दिया | यह लेख बंगाल विभाजन के विभन्न पहलुओ-इसकी पृष्ठभूमि कारण , प्रतिक्रिया परिणाम एवं एतिहासिक महत्व का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत करता हैं |
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
बंगाल प्रांत का विशाल आकार
बिसवी शताब्दी के प्रारंभ तक ब्रिटिश भारत का सबसे विशाल और सबसे अधिक जनसंख्या वाला प्रांत था |1905 मे इसकी जनसंख्या लगभग 8.5 करोड़ थी और यह वर्तमान पश्चिम बंगाल, बिहार, ओडिशा, असम, झारखंड एवं बांग्लादेश के समस्त क्षेत्र को सम्मिलित करता था | इतने बड़े क्षेत्र और जनसंख्या का प्रशासन करना वास्तव मे एक चुनौती कार्य था , विशेषकर इसलिए क्योंकि पूर्वी बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र उद्धोग, शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में अत्यंत पिछड़े हुए थे |
विभाजन के पूर्ववर्ती प्रस्ताव
बंगाल विभाजन का विचार कोई नवीन नहीं था और न ही पूर्णतया लॉर्ड कर्जन का मौलिक विचार था | कर्जन के आगमन से कई वर्ष पूर्व से ही ब्रिटिश अधिकारियों के मध्य यह धारणा प्रचलित थी कि बंगाल से अलग कर एक मुख्य आयुक्त के आधीन कर दिया गया था | चटगांव को पूर्वी प्रांत स्थानांतरित करने का विचार भी समय-समय पर उठता रहा था, परंतु इसे कभी कार्यान्वित नहीं किया गया। कर्जन के पूर्ववर्ती वायसराय लॉर्ड एल्गिन ने इस संवेदनशील मुद्दे को सुलगता हुआ छोड़ देना ही उचित समझा था|
लॉर्ड कर्जन: एक महत्त्वाकांक्षी वायसराय
जॉर्ज नथैनियल कर्जन 1899 से 1905 तक भारत के वायसराय रहे | वे एक अत्यंत ऊर्जावान,महत्त्वाकांक्षी और कार्यकुशल प्रशासक थे | उनके शासनकाल की एक प्रमुख विशेषता उनका यह दृढ़ विश्वास था कि ब्रिटिश साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए भारतीय राष्ट्रवाद के किसी भी उभरते हुए स्वरूप को कुचल देना आवश्यक है | इतिहासकार एस. गोपाल के शब्दों मे कर्जन ने अनजाने मे ही “एक सौम्य राष्ट्रवादी भावना को “एक आक्रोशपूर्ण क्रांतिकारी आंदोलन में बदल दिया” |
विभाजन की घोषणा एवं कार्यान्वयन
बंगाल विभाजन की घोषणा 20 जुलाई 1905 को की गई थी इस योजना के अनुसार बंगाल प्रांत को दो भागों में विभाजित किया जाना था:
- बंगाल: इसमे पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीशा सम्मिलित थे | इसकी राजधानी कलकत्ता रही यहाँ हिन्दू बहुमत में थे |
- पूर्वी बंगाल और असम: इसमे चटगांव, ढाका और राजशाही संभाग तथा असम सम्मिलित थे | इसकी राजधानी ढाका थी और यहाँ मुस्लिम बहुतमत में थे |
यही विभाजन 16 अक्टूबर 1905 को कार्यान्वित किया गया था | उल्लेखनीय है की इस तिथि तक स्वयं लॉर्ड कर्जन भारत छोड़ चुके थे, क्योंकि भारतीय सेना के कमांडर-इन -चीफ के पद और भूमिका के साथ संबंध में उनके विचारों को लंदन मे अस्वीकार कर दिए जाने पर उन्होंने कुछ सप्ताह पूर्व ही त्यागपत्र डे दिया था |
कर्जन का दौरा और मुस्लिम समर्थन की रणनीति
1904 मे लॉर्ड कर्जन ने पूर्वी बंगाल का दौरा किया | यह दौरा प्रत्यक्ष रूप से जनमत जानने के लिए था, किन्तु वास्तव में इसका उद्देश्य विभाजन के प्रति समर्थन जुटाना था | ढाका के नवाब सलीमुल्लाह ने कर्जन सलीमुल्लाह ने कर्जन का भव्य स्वागत किया | नवाब ने इस विभाजन को मुसलमानों के लिए एक अवसर के रूप मे देखा | कर्जन ने ढाका में 18 फरवरी 1804 को दिए अपने भाषण में कहा की “विभाजन ढाका को एक नए स्वशासी प्रशासन का केंद्र और संभवतः राजधानी बना देगा, जो अपनी संख्यात्मक शक्ति और श्रेष्ठ संस्कृति के कारण इन जिलों के लोगों को इस प्रकार निर्मित प्रांत मे एक प्रमुख आवाज़ प्रदान करेगा, जो मुसलमानों को एकता प्रदान करेगी जैसी उन्हें प्राचीन मुस्लिम वायसराय और राजाओं के दिनों से प्राप्त नहीं थी”|
विभाजन के कारण: प्रशासनिक आवश्यकता या राजनीतिक षड्यंत्र?
आधिकारिक औचित्य: प्रशसनिक दक्षता
ब्रिटिश सरकार ने विभाजन का मुख्य कारण प्रशासनिक आवश्यकता बताया | उनका तर्क था था कि बंगाल इतना विशाल हो गया था कि उसका कुशलतापूर्वक प्रशसन करना कठिन हो गया था | लगभग 8.5 करोड़ की जनसंख्या वाले प्रांत में एक ही स्थान से पूरे क्षेत्र पर ध्यान और सभी क्षेत्रों का समुचित विकास सुनिश्चित करना असंभव था | विशेषकर पूर्वी क्षेत्रों की उपेक्षा की जा रही थी | ब्रिटिश अधिकारियों का कहना था कि विभाजन के बाद प्रशसनिक दक्षता में सुधार होगा और पूर्वी बंगाल बेहतर ढंग से हो सकेगा |
वास्तविक कारण: राष्ट्रवाद का दमन और सांप्रदायिक विभाजन
तथापि, भारतीय राष्ट्रवादी नेताओ और इतिहासकारों ने विभाजन के पीछे ब्रिटिश सरकार के वास्तविक उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से पहचान लिया था | विभाजन के पीछे दो प्रमुख उद्देश्य थे: पहला, बंगाल में उभरते हुए राष्ट्रवादी आंदोलन को दबाना और दूसरा, मुस्लिम अलगाववाद को बढ़ावा देना |
कलकत्ता का ‘भद्रलोक’ (शिक्षित,सम्मानित वर्ग) ब्रिटिश शासन का सबसे मुखर आलोचक बन चुका था | पुलिस आयुक्त एंड्रयू फ्रेजर ने कर्जन को चेतावनी दी थी कि ढाका और मैमनसिंह “विश्व रूप से बंगाली आंदोलन के केंद्र बन गए है जो चरित्र में राजद्रोही है “| विभाजन के द्वारा ब्रिटिश सरकार ने ‘भद्रलोक’ वर्ग को बिहार और उड़ीसा के अपेक्षाकृत कम राजनीतिक रूप से सक्रिय हिंदुओं के साथ जोड़कर उनकी शक्ति को क्षीण करने का प्रयास किया|
विभाजन का दूसरा उद्देश्य मुस्लिम अलगाववाद को प्रोत्साहित करना था | पूर्वी बंगाल में मुस्लिम बहुत क्षेत्र को एक अलग प्रांत बनाकर ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों के मध्य यह भावना जाग्रत करने का प्रयास किया कि ब्रिटिश शासन ही उनके हीतो का सच्चा संरक्षक है| यह नीति ‘फूट डालो और राज करो’ के सिद्धांत पर आधारित थी |
राष्ट्रवादी प्रतिक्रिया और स्वदेशी आंदोलन
विभाजन-विरोधी आंदोलन
बंगाल विभाजन ने भारतीय राष्ट्रवादियों में अभूतपूर्व आक्रोश उत्पन्न किया | बंगाल के हिन्दुओ ने विभाजन को अपनी ‘मातृभूमि’ का अंग-विच्छेदन माना | 16 अक्टूबर 1905 को विभाजन के कार्यान्वयन के अवसर पर पूरे बंगाल में शोक दिवस मनाया गया | लोगों ने उपवास रखा, स्नान नहीं किया, रसोई मे आग नहीं जलाई और पूरा देश शोक मनाया |
रवींद्रनाथ टैगोर ने इसी अवसर पर अपना प्रसिद्ध गीत ‘आमार सोनार बांग्ला’(मेरा सोने का बंगाल ) की रचना की, जो बाद मे स्वतंत्र बांग्लादेश का राष्ट्रगान बना | यह गीत बंगाली राष्ट्रवाद और एकता का प्रतीक बन गया |
स्वदेशी आंदोलन: विरोध का नवीन स्वरूप
7 अगस्त 1905 को कलकत्ता के टाउन हॉल मे एक विशाल जंसभा में स्वदेशी आंदोलन की औपचारिक घोषणा की गई | यह आंदोलन ब्रिटिश विरोधी आंदोलन का एक नवीन और अधिक प्रभावशाली स्वरूप था, जिसने आर्थिक विचारधारा को तात्कालिक राजनीतिक उद्देश्य-बंगाल विभाजन का विरोध- के साथ संश्लेषित किया |
स्वदेशी आंदोलन के दो प्रमुख पहलू थे:
- बहिष्कार: ब्रिटिश वस्तुओ,विशेषकर वस्त्रों का वाहिष्कार किया गया | लोगों ने विदेशी वस्त्रों की होली जलाई और ब्रिटिश उत्पादों को खरीदने से इनकार कर दिया|
- स्वदेशी: स्वदेशी वस्तुओं, विशेषकर भारतीय हथकरघा और कुटीर उद्धोगों के उत्पादों के प्रयोग को बढ़ावा दिया गया | स्वदेशी वस्त्रों का उपयोग राष्ट्रभक्ति का प्रतीक बन गया |
इस आंदोलन का भारतीय उद्धोगों पर व्यापक प्रभाव पड़ा | बैंकों के विकास को भी स्वदेशी आंदोलन ने प्रोत्साहन दिया, जैसे कि इस तथ्य से स्पष्ट है कि 1905 में 5 लाख रुपये या अधिक की पूंजी और आरक्षित निधि वाले बैंकों की संख्या 9 थी, जो प्रथम विश्व युद्ध से पूर्व 1913 में बढ़कर दुगुनी अर्थात 18 हो गई |
सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रीय शिक्षा
स्वदेशी आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा पर भी विशेष बल दिया गया | बंगाल में कोई राष्ट्रीय विश्वविद्यालय और महाविद्यालय स्थापित किए गये | 15 अगस्त 1906 को बंगाल नेशनल कॉलेज की स्थापना की गई, जिसमे अरबिंदो घोष प्रथम प्राचार्य नियुक्त हुए | बाद में इसी संस्थान का विकास जदावपुर विषविद्यालय के रूप मे हुआ |
क्रांतिकारी गतिविधियों का उदय
विभाजन के विरुद्ध आंदोलन ने बंगाल में क्रांतिकारी गतिविधियों को भी जन्म दिया | ‘अनुशीलन समिति’ और जुगान्तर जैसे गुप्त संगठन सक्रिय हुए | अरबिंदो घोष, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओ ने अंग्रेजी शासन की विरुद्ध उग्र राष्ट्रवाद का प्रचार किया | स्वेदशी बंगाल की सबसे महत्वपूर्ण विरासतों मे से एक क्रांतिकारी गतिविधि थी, जिसने एक पीढ़ी या अधिक समय तक युवाओ को प्रभावित किया |
मुस्लिम प्रतिक्रिया: एक विभाजित समुदाय
बंगाल विभाजन के प्रति मुस्लिम समुदाय की प्रतिक्रिया एक समान नहीं थी | पूर्वी बंगाल के अधिकांश मुसलमानों ने इस विभाजन का स्वागत किया, क्योंकि वे मानते थे की इससे उनकी शैक्षणिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति में सुधार होगा | ढाका में नए विश्वविद्यालय की स्थापना का वादा भी मुसलमानों के लिए आकर्षक था। नवाब सलीमुल्लाह के नेतृत्व में मुसलमानों ने ब्रिटिश सरकार का समर्थन किया।
दूसरी ओर, कुछ प्रबुद्ध मुस्लिम नेता जैसे बैरिस्टर अब्दुल रसूल ने विभाजन का विरोध किया और राष्ट्रवादी आंदोलन का समर्थन किया | तथापि, यह एक अपवाद था | कुल मिलाकर,विभाजन ने हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच को और बढ़ा दिया |
स्वदेशी आंदोलन की सीमाएं
स्वदेशी आंदोलन की एक प्रमुख दुर्बलता यह थी कि यह मुस्लिम जनसमूह का समर्थन प्राप्त करने में असफल रहा | इसके अतिरिक्त चरमपंथी नेताओ ने इस आंदोलन को एक प्रमुख हिन्दू स्वरूप प्रदान कर दिया | उन्होंने प्राचीन भारतीय संस्कृति पर बल दिया और मध्यकालीन भारतीय संस्कृति की उपेक्षा की | वे भारतीय संस्कृति की पहचान हिन्दू धर्म और भारतीय राष्ट्र की पहचान हिन्दुओ से करने लगे | इसके परिणासावरूप, मुस्लिम समुदय इस आंदोलन से दूर होता गया और संप्रदीयक ध्रुवीकरण को बल मिला |
मुस्लिम लीग की स्थापना
बंगाल विभाजन के परिणामस्वरूप ही दिसंबर 1906 में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई | नवाब सलीमुल्लाह और आगा खान के नेतृत्व में स्थापित इस संगठन का मुख्य उद्देश्य ब्रिटिश शासन के प्रति मुसलमानों की निष्ठा को प्रदर्शित करना और मुसलमानों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना था विभाजन ने मुसलमानों को सांप्रदायिक आधार पर अपना राष्ट्रीय संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया |
विभाजन का उन्मूलन (1911)
निरंतर विरोध और आंदोलन
भारतीय जनता के लगातार विरोध और आंदोलन के कारण ब्रिटिश सरकार को अंततः अपना निर्णय वापस लेना पड़ा | स्वदेशी आंदोलन और विभाजन और विभाजन-विरोध आंदोलन ने ब्रिटिश शासन के समक्ष यह स्पष्ट कर दिया कि भारतीय जनमत की अवहेलना करके शासन करना अब संभव नहीं होगा|
राजधानी का स्थानांतरण
1911 में ब्रिटिश सरकार ने बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया | इसी वर्ष एक और महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया-भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया | राजधानी स्थानांतरित के पीछे कई कारण थे-भौगोलिक, राष्ट्रवाद के नियंत्रण से संबंधित और राजनीतिक कारण | कलकत्ता जो बंगाली राष्ट्रवाद का केंद्र बन चुका था, अब ब्रिटिश सरकार के लिए असुविधाजनक हो गया था |
मुस्लिम प्रतिक्रिया और सांप्रदायिक असंतोष
विभाजन के उन्मूलन से मुस्लिम समुदाय में गहरी निराशा व्याप्त हुई | जिन मुसलमानों ने विभाजन का समर्थन किया था, वे इसे ब्रिटिश सरकार का विश्वासघात मानने लगे | विभाजन और इसके उन्मूलन ने हिन्दू और मुस्लिम समुदायों के बीच की खाई को और चौड़ा कर दिए बंगाल में बिसवी शताब्दी के प्रथमार्ध में अनेक सांप्रदायिक दंगे हुए, जो हिंदू राष्ट्रवाद और मुस्लिम कट्टरवाद के बीच संघर्ष के परिणाम थे|
ऐतिहासिक चेतना का विकास
बंगाल विभाजन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था | इसने राष्ट्रवादी चेतना के विकास को प्रोत्साहित किया और पहली बार जन साधारण को राजनीतिक आंदोलन से जोड़ा | बंगाल में जन्मी राष्ट्रीय भावना की नवीन धारा ने समस्त भारत को आप्लावित कर दिया। ‘वंदे मातरम्’ कांग्रेस का राष्ट्रीय गान बन गया, जिसके शब्द बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यास ‘आनंदमठ’ से लिए गए थे और संगीत रवींद्रनाथ टैगोर ने दिया था।
सांप्रदायिक ध्रुवीकरण
प्रथम विभाजन ने राष्ट्रवादी चेतना के विकास को प्रोत्साहन दिया और इसके परिणामस्वरूप मुस्लिम अलगाववाद को जन्म दिया | यह बंगाल का पहला विभाजन था, जिसने 1947 में होने वाले द्वितीय विभाजन की पृष्टभूमि तैयार की | यह तथ्य उल्लेखनीय है कि लॉर्ड कर्जन द्वारा 1905 में किए गए बंगाल विभाजन का गंभीर परिणाम 1947 में पृथक देश पाकिस्तान के रूप में उभरकर सामने आया |
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की प्रथम सफलता
बंगाल विभाजन का उन्मूलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन की प्रथम वास्तविक विजय थी | इसने यह सिद्ध कर दिया कि संगठित जन आंदोलन के द्वारा ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नीतियों को बदला जा सकता है | यह आत्मविश्वास भविष्य के आंदोलनों के लिए अत्यंत प्रेरक सिद्ध हुआ |
स्वदेशी आंदोलन की विरासत
यधापी स्वदेशी आंदोलन 1908 तक क्षीण हो गया, किन्तु इसके आदर्श भविष्य की राजनीतिक गतिविधियों को प्रभावित करते रहे और महात्मा गांधी के असहयोग और अहिंसक प्रतिरोध के अभियानों का आधार बने | स्वदेशी ने भारतीय उद्धोगों और स्वावलंबन की भावना को बढ़ावा दिया, जो भविष्य में आत्मनिर्भर भारत की नींव बनी।
बांग्लादेश का उदय
1905 का बंगाल विभाजन बांग्लादेश के निर्माण की दिशा में पहला कदम था | इसने पूर्वी बंगला में मुस्लिम पहचान की राजनीति को जन्म दिया, जो 1947 में पाकिस्तान के निर्माण और 1971 में बांगलादेश के स्वतंत्र राष्ट्र के रूप मे उदय का मार्ग प्रशस्त करने वाला सिद्ध हुआ | 1905 का विभाजन एक दीर्घकालिक विभाजन का पदचिह्न छोड़ गया जिसने उपमहाद्वीप के इतिहास को बदलकर रख दिया।
निष्कर्ष: इतिहास से सीखें
बंगाल विभाजन सिर्फ इतिहास का एक पन्ना नहीं हैं | यह हमे बताता है की कैसे ‘बांटने और राज करने’ की राजनीति देश और समाज को तबाह कर सकती हैं | आज भी जब हम सांप्रदयिक सौहार्द की बात करते हैं, तो 1905 का वो सबक हमें याद रखना चाहिए कि एकता में ही हमारी असली ताकत है |
आपको यह लेख कैसा लगा? निचे कमेन्ट में जरूर बताए | और आपको लगता है कि यह जानकारी और लोगों तक पहुंचनी चाहिए, तो इसे शेयर करना न भूले | वंदे मातरम!
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
स्वदेशी आंदोलन आज के ‘मेक इन इंडिया’ से कैसे जुड़ा है ?
दोनों की मूल भावना एक ही हैं- अपने देश का समान खरीदे और देश को आत्मनिर्भर बनाए |
बंगाल विभाजन कब और क्यों हुआ?
बंगाल का विभाजन 16 अक्टूबर 1905 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन द्वारा किया गया था | आधिकारिक कारण प्रशसनिक सुविधा (बड़ा प्रांत ) बताया गया था, लेकिन वास्तविक उद्देश्य बंगाल में बाढ़ रहे राष्ट्रवाद और स्वतंत्रता आंदोलन को कमजोर करना था हिन्दू और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दरार पैदा करना था |
1947 में दंगे क्यों हुए थे ?
अगस्त 1947 में अंग्रेजों ने भारत छोड़ा और धर्म के आधार पर भारत का विभाजन हुआ| 14 अगस्त को पाकिस्तान बनाया गया | विभाजन के बाद मुसलमानों और हिन्दुओ ने नई बनी सीमा लांघी और भयानक दंगे भड़के
बंगाल विभाजन कौन चाहता था और क्यों ?
लॉर्ड कर्जन 1899 से 1905 तक भारत के वायसराय रहे | 1905 में हुआ बंगाल का विभाजन उनके वायसराय काल का सबसे विवादास्पद कार्य था | उन्होंने प्रशासनिक दक्षता के आधार पर बंगाल को दो क्षेत्र में विभाजित करने की वकालत की थी |
बंगाल का अंतिम हिन्दू राजा कौन था?
राजा सीताराम राय एक स्व-निर्मित हिन्दू राजा थे जिन्होंने अपनी प्रतिभा, वीरता और नेतृत्व के बल पर एक छोटा स साम्राज्य स्थापित किया | वे बंगाल के अंतिम हिन्दू राजा भी थे जिन्हे मुर्शिद कुली खान द्वारा मुत्युदंड दिया गया था |
After I originally commented I seem to have clicked the -Notify me
when new comments are added- checkbox and now each time a comment is added I recieve 4 emails
with the same comment. There has to be an easy method you are able to remove me from that service?
Thanks a lot!