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सविनय अवज्ञा आंदोलन

Civil Disobedience Movement

क्या आपने कभी सोचा है कि कैसे एक चुटकी नमक ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य की जड़े को हिला कर रख दिया? जी हाँ, बात सुनने में शायद किसी फिल्मी कहानी जैसी लगे, लेकिन यह भारतीय इतिहास का वह पन्ना है जिसने करोड़ों भारतीयों के दिलों में आजादी की आग को शोला बना दिया | हम बात कर रहे हैं सविनय अवज्ञा आंदोलन  (Civil Disobedience Movement) की | यह महज़ एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था; यह एक भावना थी, एक सैलाब था जिसने अंग्रेजों को यह बता दिया की अब भारत चुप बैठने वाला नहीं हैं | आइए, इस एतिहासिक यात्रा पर मेरे साथ चलें और समझे की कैसे गांधीजी के एक अहिंसक कदम ने इतिहास रच दिया |

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प्रस्तावना: यह सब कैसे शुरू हुआ ?

हर बड़े तूफान से पहले एक शांति होती है, और फिर धीरे-धीरे हवाओ का रुख बदलता है | सविनय अवज्ञा आंदोलन कोई रातों-रात लिया गया फैसला नहीं था | 1920 के दशक के अंत तक, भारतीय राजनीति मे काफी उथल-पुथल मच चुकी थी | असहयोग आंदोलन के वापस लिए जाने के बाद देश में जो एक राजनीतिक शून्यता आ गई थी, वह धीरे-धीरे गुस्से मे बदल रही थी | युवा क्रांतिकारी आगे आ रहे थे, किसान परेशान थे, अरु वैश्विक आर्थिक मंदी ने भारत तोड़ दी थी | ऐसे माहौल में, देश को एक नई दिशा की जरूरत थी, और वह दिशा महात्मा गांधी ने दिखाई |

साइमन कमीशन का विरोध और नेहरू रिपोर्ट 

जरा सोचिए, आपके घर के नियम कोई बाहरी व्यक्ति बनाए और आपसे पूछे तक नहीं, आपको कैसा लगेगा? अंग्रेजों ने बिल्कुल यही किया | 1927 मे, भारत के राजनतीक भविष्य का फैसला करने के लिए ब्रिटिश  सरकार ने ‘साइमन कमीशन’ भारत भेजा| मजे की बात (या यू कहे की अपमान की बात) यह थी की इस कमीशन मे एक भी भारतीय सदस्य नहीं था ! पूरे देश मे “साइमन गो बैक” (Simon Go Back) के नारे गूंज उठे | काले झंडे दिखाए गए | इसी विरोध के जवाब मे, भारतीयों ने अपनी खुद की एक रूपरेखा तैयार की जिसे ‘नेहरू-रिपोर्ट’ (1928) कहा गया | हालांकि अंग्रेजों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन इसने भारतीयों को एकजुट करने का काम किया |

Civil Disobedience Movement

पूर्ण स्वराज की एतिहासिक मांग

अब बात डोमिनीयन स्टेट्स(आधा-अधूरा राज्य ) से आगे बढ़ चुकी थी | दिसंबर 1929 में कॉंग्रेस का एतिहासिक लाहौर अधिवेशन हुआ | ठंड रावी नदी के तट पर, जवाहरलाल नेहरू की अध्यक्षता मे काँग्रेस ने साहसिक प्रस्ताव किया- ‘पूर्ण-स्वराज’ (Complete Independence) 26 जनवरी 1930 को देश भर में आजादी नहीं मिल जाति, वे चैन से नहीं बैठेंगे | यही वह मंच था जहां से सविनय अवज्ञा आंदोलन की पटकथा लिखी गई |

गांधीजी की 11 सूत्रीय मांगे: के अल्टिमेटम 

गांधीजी हमेशा समझौता का एक आखिरी मौका देते थे | आंदोलन छेड़ने से पहले, उन्होंने वायसराय लॉर्ड इरविन के सामने 11 सूत्रीय मांगे रखी | ये मांगे हवा-हवाई नहीं थी; इनमे आम आदमी से लेकर उद्धोगपतियों तक की परेशानी शामिल थी | भू-राजस्व (Land Revenue )50% कम करना, राजनीतिक कैदियों की रिहाई, और सबसे महत्वपूर्ण-नमक कर (Salt Tax ) को खत्म करना | अंग्रेजों को लगा यह एक बूढ़े आदमी की खोखली धमकियाँ हैं | इरविन ने इन मांगों को नजर अंदाज कर दिया | बस फिर क्या था, गांधीजी ने कह दिया “मैंने घुटने टेक कर रोटी मांगी थी, और मुझे बदले मे पत्थर मिल |” अब संघर्ष तय था |

दांडी मार्च: नमक सत्याग्रह का शंखनाद 

नमक-एक ऐसी चीज जो हर गरीब की थाली का हिस्सा है | अंग्रेजों ने इस पर भी टैक्स लगा दिया था और भारतीयों को नमक बनाने का अधिकार नहीं था | गांधीजी ने इस ‘नमक’ को अपना हथियार बनाया | यह एक मास्टरस्ट्रोक था ! 12 मार्च 1930 को, गांधीजी ने अपने 78 चुने हुए अनुयायीयों के साथ साबरमती आश्रम मे दांडी (गुजरात का एक तटीय गाँव ) की ओर पैदल यात्रा शुरू की | यही एटिहसिक दांडी मार्च(Salt March) कहलाता है |

Civil Disobedience Movement

दांडी यात्रा का मार्ग और गहरा प्रभाव 

लगभग 390 किलोमीटर का यह सफ़र 24 दिनों में तय किया गया | जैसे-जैसे गांधीजी आगे बढ़ते, गाँवों के गाँव उनके पीछे हो लेते | एक दिन की तरह, जो समंदर से मिलने से पहले विशाल रूप ले लेती है, यह मार्च एक जनसैलाब बन गया | 6 अप्रैल 1930 की सुबह, गांधीजी ने दांडी के समुन्द्र तट पर मुट्ठी भर नमक उठाकर अंग्रेजों का कानून तोड़ दिया | यह महज़ नमक बनाना नहीं था; यह ब्रिटिश सत्ता के मुँह पर तमाचा था | यह इस बात का ऐलान था कि भारतीय अब अंग्रेजों के अन्यायपूर्ण कानूनों को नहीं मानेंगे | सविनय अवज्ञा (विनम्रतापूर्णवक कानूनों का उल्लंघन ) की शुरुआत हो चुकी थी |

आंदोलन का देशव्यापी फैलाव: के जनसैलाब 

दांडी मार्च चिंगारी था, और पूरा देश बारूद की तरह तैयार बैठा था | जैसे ही गांधीजी ने नमक कानून तोड़ा, पूरे भारत में कानूनो को तोड़ने की होड़ मच गई | मद्रास में सी. राजगोपालचारी ने, तो मालाबार में के. केलप्पन ने नमक यात्राएं निकली | यह आंदोलन सिर्फ नमक तक सीमित नहीं रहा; विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई, शराब की दुकानों पर धरने दिए गए, और वकीलों ने अदालतों का वाहिष्कार किया |

महिलाओ और छात्रों की अभूतपूर्व भूमिका 

इस आंदोलन की सबसे खूबसूरत बात क्या थी? महिलाओ की भागीदारी ! पर्दे और चारदीवारी मे रहने वाली हजारों भारतीय सड़कों पर उतर आई | सरोजनी नायडू , कमलादेवी चट्टोपाध्याय  जैसी नेत्रियों ने मोर्चों संभाला | उन्होंने विदेसी कपड़ों और शराब की दुकानो  की पिकेटिंग की। छात्रों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज छोड़ दिए। यह आंदोलन सच में हर घर का आंदोलन बन गया था। 

किसानों और मजदूरों का जमीनी संघर्ष 

शहरों से निकलकर आंदोलन गाँवों तक पहुँच गया था | यूपी, बिहार और गुजरात के किसानों ने ‘नो टैक्स’ (कर नहीं देंगे) अभियान शुरू कर दिया| वन क्षेत्रों मे आदिवासियों ने वन कानून का उल्लंघन किया | महाराष्ट्र और मध्य प्रांत में मजदूरों ने हड़तालें कीं। हर वर्ग अंग्रेजों की आर्थिक नीतियों से त्रस्त था, और सविनय अवज्ञा ने उन्हें अपनी भड़ास निकालने का एक मंच दे दिया। 

उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में लाल कुर्ती आंदोलन 

पेशावर और आस-पास के इलाको मे खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हे ‘सीमांत गांधी’(Frontier Gandhi) भी कहा जाता हैं, ‘खुदाई खिदमतगार’(ईश्वर के सेवक) नाम का एक संगठन बनाया | लाल कुर्ती पहनने वाले इन पठानों ने पूरी तरह अहिंसक रहकर अंग्रेजों का विरोध किया |जब अंग्रेजों ने उन पर निहत्थे गोलियां चलवाईं, तब भी वे पीछे नहीं हटे। गढ़वाल राइफल्स के जवानों ने तो इन निहत्थे पठानों पर गोली चलाने से ही इंकार कर दिया था—यह ब्रिटिश सेना के भीतर विद्रोह का एक स्पष्ट संकेत था। 

पूर्वोत्तर मे रानी गाइदिनल्यू का योगदान

आंदोलन की आग सिर्फ उत्तर और दक्षिण भारत तक सिमित नहीं थी | नागालैंड और मणिपुर की पहाड़ियों में महज़ 13 साल की उम्र में रानी गाइदिनल्यू  ने अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह को विगुल फूंक दिया | उन्होंने अपने कबीले के लोगों को ब्रिटिश शासन के खिलाफ एकजुट किया | उन्हे 1932 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, लेकिन उनके साहस ने पूरे देश को प्रेरित किया |

ब्रिटिश सरकार का क्रूर दमन चक्र 

जब सरकार डरती है तो वह क्रूर हो जाती ब्रिटिश सरकार बौखला गई थी | उन्होंने लाठीचार्ज, गोलीबारी और सामूहिक गिरफ्तारियों का सहारा लिया | कॉंग्रेस को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया | गांधीजी और जवाहरलाल नेहरू समेट लगभग 90,000 सत्याग्रहियों को जेल मे डाल दिया गया |सेंसरशिप लगा दी गई, अखबारों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लेकिन जितना वे दबाते, आंदोलन उतना ही निखर कर सामने आता। 

गांधी-इरविन समझौता (1931):एक विराम

अंग्रेजों को समझ आ गया था कि डंडे के ज़ोर पर अब भारत पर राज नहीं किया जा सकता | अंततः वायसराय लॉर्ड इरविन को झुकना पड़ा और उन्होंने गांधीजी से बातचीत की पेशकश की| 5 मार्च 1931 को गांधी-इरविन समझौता’ हुआ | इसके तहत अंग्रेजों ने राजनीतिक कैदियों (जिन्होंने हिंसा नहीं की थी ) को रिहा करने और तटों के पास रहने वालों को नमक बनाने की छूट देने पर सहमति जताई | बदले में गांधीजी ने आंदोलन को अस्थायी रूप से स्थगित करने और दूसरे गोलमेज़ सम्मेलन में भाग लेने का वादा किया |

दूसरा गोलमेज़ सम्मेलन और आंदोलन की वापसी 

गांधीजी भारी उम्मीदों के साथ लंदन गए, लेकिन दूसरा गोलमेंज सम्मेलन पूरी तरह विफल रहा | अंग्रेज भारत को आजादी या सत्ता सौपने के मूड मे बिल्कुल नहीं थे; वे सिर्फ संप्रदीयक आधार पर भारतीयों को बाटने मे लगे थे (जैसे दलितों के लिए अलग निर्वाचक मंडल )| निराश गांधीजी जब दिसंबर 1931 में भारत लौटे, तो उन्होंने देखा कि सरकार ने फिर से दमन चक्र शुरू कर दिया है। नेहरू और गफ्फार खान पहले ही जेल में थे। मजबूरी में, 1932 में गांधीजी ने फिर से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू कर दिया। 

आंदोलन का अंत और परिणाम

आंदोलन का दूसरा चरण पहले जितना जोरदार नहीं था | लोगों में थकान आ गई थी, और ब्रिटिश सरकार ने इस बार पहले से भी ज्यादा क्रूरता दिखाई | 1934 आते-आते, गांधीजी ने महसूसू किया की जनता अब इस लंबे संघर्ष को जारी रखने की स्थिति मे नहीं है | अंततः, मई 1934 में आंदोलन को आधिकारिक तौर पर वापस ले लिया गया | कुछ लोगों लो लगा कि यह एक हार हैं, लेकिन असल मे ऐसा नहीं था |

सविनय अवज्ञा आंदोलन का एतिहासिक महत्व

भले ही हमे 1934 में आजादी नहीं मिली, लेकिन इस आंदोलन ने जो नींव रखी, उस पर ही 1947 की इमारत खड़ी हुई | इसने क्या बदला ?

पहला, इसने कॉंग्रेस को सिर्फ पढे-लिखे लोगों की पार्टी से निकालकर आम आदमी किसानों और मजदूरों की पार्टी बना दिया | दूसरा इसने महिलाओ को घर से निकालकर राजनीति केंद्र मे ला खड़ा किया | तीसरा और महत्वपूर्ण, इसने भारतीयों के मन से अंग्रेजों का ‘डर’ पूरी तरह खत्म कर दिया | अब एक आम हिन्दुस्तानी छाती तान कर ब्रिटिश पुलिस की लाठी खाने को तैयार था |इसी आंदोलन का दबाव था कि अंग्रेजों को 1935 का भारत सरकार अधिनियम लाना पड़ा, जिसने कुछ हद तक प्रांतीय स्वायत्तता (Provincial Autonomy) दी।  

निष्कर्ष: आज के समय में इसकी प्रासंगिकता

सविनय अवज्ञा आंदोलन सिर्फ इतिहास की  किताबों का हिस्सा नहीं है ; यह अन्याय से लड़ने का एक अमर तरीका है | गांधीजी ने दुनिया को सिखाया की अगर कानून गलत हैं, तो उसे विनम्रता लेकिन दृढ़ता के साथ तोड़ना आपका नैतिक कर्तव्य हैं | जब तक दुनिया में शांतिपूर्ण विरोध,सत्य और अहिंसा के विचार जिंदा रहेंगे, दांडी मार्च और सविनय अवज्ञा की गूंज सुनाई देती रहेगी |यह हमें सिखाता है कि बड़े बदलावों के लिए हमेशा हथियारों की जरूरत नहीं होती; एक मजबूत इरादा और एक ‘मुट्ठी नमक’ भी काफी हो सकता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नमक हर घर की बुनियादी जरूरत थी, चाहे वह गरीब हो या अमीर, हिंदू हो या मुस्लिम। अंग्रेजों के नमक एकाधिकार और भारी टैक्स ने हर भारतीय को प्रभावित किया था। इसलिए, नमक एक ऐसा शक्तिशाली और भावनात्मक प्रतीक था जो पूरे देश को तुरंत एकजुट कर सकता था।

लाल कुर्ती (Red Shirts) आंदोलन उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत (NWFP) में ‘खुदाई खिदमतगार’ संगठन द्वारा चलाया गया था। इसके प्रणेता खान अब्दुल गफ्फार खान थे, जिन्हें ‘सीमांत गांधी’ भी कहा जाता है। उन्होंने पश्तूनों को अहिंसक विरोध के लिए संगठित किया था।

तत्काल राजनीतिक आज़ादी (पूर्ण स्वराज्य) के लक्ष्य के नजरिए से देखें तो यह तुरंत सफल नहीं हुआ और 1934 में इसे वापस लेना पड़ा। लेकिन दीर्घकालिक नजरिए से यह बेहद सफल था क्योंकि इसने भारतीय जनमानस में आज़ादी की अटूट ललक पैदा कर दी और ब्रिटिश शासन की नैतिक वैधता को खत्म कर दिया।

दांडी मार्च 12 मार्च 1930 को साबरमती आश्रम से शुरू हुआ था और 6 अप्रैल 1930 को दांडी पहुंचकर संपन्न हुआ। यह लगभग 390 किलोमीटर की यात्रा थी जिसे गांधीजी और उनके 78 अनुयायियों ने 24 दिनों में पैदल चलकर पूरा किया था।


 



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