डॉ. बी.आर. अंबेडकर: एक महान नायक की जीवन गाथा
क्या आपने कभी सोचा है की ऐसा व्यक्ति जिसे बचपन में पानी पीने के लिए भी दूसरों की दया पर निर्भर रहना पड़ता था, वह आगे चलकर उसी देश का कानून कैसे लिख सकता हैं? यह कोई फिल्मी कहानी नहीं हैं, दोस्तों | यह कहानी है भारत के सबसे चमकते सितारे, डॉ भीमराव रामजी अंबेडकर की| आज हम एक साधारण लेख नहीं पढ़ रहे हैं,बल्कि एक ऐसे सफर पर निकल रहे हैं जिसने करोड़ों भारतीयों की किस्मत को हमेशा के लिए बदल कर रख दिया| तो चलिए बिना किसी देरी के इस प्रेरणादायक सफ़र की शुरुआत करते हैं |
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!परिचय: वह चिंगारी जिसने बदलाव की आग लगाई
14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के महू छावनी में एक बालक का जन्म हुआ | नाम रखा गया ‘भीमराव’| उस समय किसी ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि महार जाति (जिसे उस समय अछूत माना जाता था ) में जन्मा यह बच्चा एक दिन पूरे देश की दशा और दिशा बदल देगा| बाबासाहेब का जीवन शुरुआत से ही कांटों से भरा था | उनके पिता रामजी मालोजी सकपाल सेना में सूबेदार थे, लेकिन सेना में होने के बावजूद समाज की जातिवादी मानसिकता ने उनका पीछा नहीं छोड़ा |
1.1 बचपन के संघर्ष: छुआछूत की गहरी छाया
जरा सोचिए,आप स्कूल जाना चाहते हैं, लेकिन आपको क्लास के अंदर बैठें की इजाजत नहीं हैं| आपको एक फटे हुए बोरे पर दरवाजा के बाहर बैठना पड़ता है| प्यास लगने पर आप खुद पानी नहीं पी सकते, कोई स्वर्ण चपरासी दूर से आपके हाथों मे पानी गिराएगा, तभी आपकी प्यास बुझेगी | और अगर चपरासी नहीं आया, तो पूरे दिन प्यासा रहना पड़ेगा | इसे अंबेडकर ने “नो प्यून, नो वाटर” (No Peon, No Water) का नाम दिया था। यह दर्द, यह अपमान किसी भी आम इंसान को तोड़ सकता था, लेकिन भीमराव आम नहीं थें |
1.1.1 शिक्षा के लिए अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प
अपमान की इस आग ने उन्हे जलाया नहीं, बल्कि सोने की तरह तपाकर कुंदन बना दिया उन्होंने तय कर लिया कि इस सड़ी-गली व्यवस्था को बदलने का केवल एक ही हथियार है शिक्षा उन्होंने बॉम्बे के एल्फिंस्टन हाई स्कूल में दाखिला लिया। वह उस स्कूल में पढ़ने वाले पहले दलित छात्र थे। हर कदम पर ताने सुने, लेकिन उनका ध्यान सिर्फ अपनी किताबों पर था।
2. विदेश में उच्च शिक्षा और विचारों का अद्भुत विकास
भारत में शिक्षा के दौरान जो अपमान सहा, उसने बाबासाहेब को और बड़ा सोचने पर मजबूर किया | किस्मत ने तब करवट ली जब बड़ौदा के महाराज सायाजीराव गायकवाड ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हे छात्रवृत्ति (Scholarship) दी| यह उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट था |
2.1 कोलम्बिया से लंदन तक का एतिहासिक सफर
1913 में वह अमेरिका के कोलंबिया विश्वविद्यालय पहुंचे| सोचिए, एक ऐसा देश जहां कोई जात-पात नहीं थी| वहाँ उन्हे पहली बार बराबरी का अहसास हुआ | उन्होंने अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, इतिहास और राजनीति विज्ञान में महारत हासिल की| इसके बाद वे लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (LSE) गए। उनके पास M.A., Ph.D., M.Sc., D.Sc., और बैरिस्टर-एट-लॉ जैसी डिग्रियां थीं। उस समय पूरे भारत में शायद ही कोई दूसरा व्यक्ति उनके जितना पढ़ा-लिखा रहा हो।
3. सामाजिक न्याय का प्रचंड शंखनाद
विदेश से पढ़कर जब वे लौटे, तो उनके पास दुनिया की सबसे बड़ी डिग्रीयां थीं, लेकिन भारत की मानसिकता नहीं बदली थी | बड़ौदा में नौकरी के दौरान उनके मातहत काम करने वाले चपरासी भी उन्हे फाइलें दूर से फेक कर देते थे | तब उन्हे एहसास हुआ की केवल खुद के शिक्षित होने से कुछ नहीं होगा, पूरे समाज को जगाना होगा | उन्होंने मुकनायक (Mooknayak) और बहिष्कृत भारत (Bahishkrit Bharat) जैसे अखबार शुरू किए।
3.1 महाड सत्याग्रह:पानी का अधिकार, इंसान का अधिकार
मार्च 1927 का वह ऐतिहासिक दिन| महाराष्ट्र का महाड शहर | यह सिर्फ पानी पीने का आंदोलन नहीं था, दोस्तों| यह मानव गरिमा को पुन: प्राप्त करने का एक महासंग्राम था | चौदार तालाब का पानी जानवर पी सकते थे, लेकिन अछूत नहीं | बाबासाहेब ने हजारों अनुयायियों के साथ जाकर उस तालाब का पानी पिया और एक जोरदार संदेश दिया |
3.1.1 मानुस्मृति दहन: असमानता का प्रतीकात्मक विरोध
महाड सत्याग्रह के दौरान ही 25 सितंबर 1927 को उन्होंने खुलेआम ‘मानुस्मृति’ वह प्राचीन ग्रंथ था जिसे जाति व्यवस्था और छुआछूत का आधार माना जाता था | इसे जलाकर उन्होंने सदियों पुरानी गुलामी की मानसिकता को चुनौती दी थी |
4. राजनीतिक सफ़र और गोलमेज सम्मेलन
बाबासाहेब समझ चुके थे कि बिना राजनीतिक सत्ता के समाज का उद्दार नहीं हो सकता | 1930 के दशक में लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलनों (Round Table Conferences) में उन्होंने अछूतो का पुरजोर प्रतिनिधित्व किया | उन्होंने ब्रिटिश सरकार से दलितों के लिए ‘पृथक निर्वाचक मंडल (Separate Electorates) की मांग की, जिसे अंग्रेजों ने भी मान लिया |
4.1 पुन पैक्ट: महात्मा गांधी और अंबेडकर के बीच वैचारिक मंथन
लेकिन महात्मा गांधी इस फैसले के खिलाफ थे| गांधी जी का मानना था कि इससे हिन्दू समाज बंट जाएगा | उन्होंने यरवदा जेल में आमरण अनशन शुरू कर दिया | गांधी जी की जान बचाने के भारी दवाब के बीच,24 सितंबर 1932 को अंबेडकर और गांधी जी के समर्थकों के बीच ‘पूना पैक्ट’(Poona Pact) पर हस्ताक्षर हुए | इसके तहत पृथक निर्वाचक मंडल की मांग वापस ले ली गई, लेकिन इसके बदले में प्रांतीय और केन्द्रीय परिषदों में दलितों के आरक्षित सीटों की संख्या काफी बढ़ा दी गई | यह भारतीय इतिहास का एक बहुत बड़ा वैचारिक समझौता था |
5. संविधान के शिल्पकार: एक नए,समतामूलक भारत की नींव
15 अगस्त 1947 को देश आज़ाद हुआ | अब सबसे बड़ी चुनौती थी देश देश को चलाने के लिए एक नियम-कानून बनना| भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने गांधी जी की सलाह पर डॉ भीम राव अंबेडकर को देश का पहला कानून मंत्री बनाया|
5.1 ड्राफ्टिंगह कमेटी के अध्यक्ष के रूप में अद्वितीय भूमिका
29 अगस्त 1947 को उन्हे संविधान निर्माण की सबसे अहम ‘प्रारूप समिति’ (Drafting Committee) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया उन्होंने दिन-रात एक कर दिया| दुनिया भर के 60 से अधिक देशों के संविधानो का अध्ययन किया | उनका लक्ष्य एक ऐसा संविधान बनाना था जो भारत की विविधताओ को समेट सके और हर नागरिक को बराबरी का हक दे सके |
5.1.1 महिलाओ और मजदूरों के अधिकारों की रक्षा (हिन्दू कोड बिल )
संविधान के अनुच्छेद 14(समानता) और अनुच्छेद 17(छुआछूत का अंत ) उनकी ही देन हैं | इसके अलावा, उन्होंने महिलाओ को पैतृक संपत्ति में अधिकार दिलाने और विवाह-तलाक के समान अधिकार देने के लिए ‘हिन्दू कोड बिल’ (Hindu Code Bill) संसद में पेश किया| जब कट्टरपंथियों के विरोध के कारण यह बिल पास नहीं हो सका , तो उन्होंने कानून मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया| यह दिखाता है की वह अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं करते थे |
6. अर्थशास्त्री अंबेडकर: भारतीय रिजर्व बैंक के असल प्रेरणास्रोत
क्या आपको मालूम है कि हमारे देश का केन्द्रीय बैंक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), बाबासाहेब के विचारों की ही उपज है ? जी हाँ! 1925 में उन्होंने एक किताब लिखी थी-” The Problem of the Rupee: Its Origin and its Solution”. जब हिल्टन यंग कमीशन (Hilton Young Commission) भारत मे बैंकिंग का ढाँचा तैयार करने आया तो उन्होंने अंबेडकर के इन्ही अर्थशास्त्री विचारों को RBI की स्थापना का आधार बनाया | उन्होंने भारत की कृषि समस्याओ, औद्योगीकरण और जल नीति पर भी बेहतरीन शोध किए थे आज भी मिल के पत्थर हैं |
7. बौद्ध धर्म की ओर एतिहासिक कदम: एक आध्यात्मिक क्रांति
जीवन के अंतिम वर्षों में बाबासाहेब इस नतीजे पर पहुँचे की हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था में सुधार संभव नहीं हैं| उन्होंने 1935 में ही घोषणा कर दी थी कि “मैं हिन्दू पैदा हुआ हूँ, यह मेरे वश में नहीं था, लेकिन मैं हिन्दू मरूंगा नहीं|” वे एक ऐसे धर्म की तलाश में थे जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व (Liberty,Equality,Fraternity) पर आधारित हो |
7.1 नागपुर दीक्षाभूमि का वह युग-परिवर्तक दिन
सालों के गहन अध्ययन के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म को चुना | 14 अक्टूबर 1956 को नागपूर के एतिहासिक मैदान (जिसे आज दीक्षाभूमि कहा जाता है ) में, उन्होंने अपनी पत्नी डॉ. सविता अंबेडकर और लगभग 5 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म ग्रहण किया | यह दुनिया के इतिहास का सबसे बड़ा शांतिपूर्ण धर्मांतरण था |
8. अंबेडकर के विचारों की आज के आधुनिक समय में प्रासंगिकता
6 दिसंबर 1956 को बाबासाहेब ने इस दुनिया के अलविदा कह दिया (जिसे महापरिनिर्वाण दिवस के रूप मे मनाया जाता है )| लेकिन उनके विचार आज भी उतने ही ज़िंदा हैं | आज जब हम महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं, तो हमे याद रखना चाहिए की इसकी कानूनी नींव उन्होंने ही रखी थी | आज जब हम एक स्थिर अर्थव्यवस्था देखते हैं, तो उसमें उनकी दूरदर्शिता शामिल है।
8.1 “शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो” का मूल मंत्र
यह सिर्फ एक नारा नहीं है, बल्कि हर शोषित और वंचित वर्ग के लिए संजीवनी बूटी है | शिक्षा वह शेरनी का दूध हैं जो पिएगा वह दहाड़ेगा | उनका मानना था की जब तक समाज में सामाजिक समानता नहीं आती, तब तक राजनीतिक आजादी का कोई मतलब नहीं है |
9.निष्कर्ष: युगों-युगों तक रोशन रहेगा यह नाम
डॉ. बी.आर.अंबेडकर केवल एक दलित नेता नहीं थे; वह पूरे भारत के निर्माता थे| वह एक ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने कलम की ताकत से तलवारों से भी बड़े बदलाव ला दिए | उन्होंने सिखाया कि परिस्थितियां कैसी भी हों, अगर इंसान के भीतर इच्छाशक्ति है, तो वह पहाड़ों का सीना चीर कर भी रास्ता बना सकता है। जब भी भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों, न्याय और समानता की बात होगी, बाबासाहेब का नाम हमेशा सूरज की तरह चमकता रहेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना में बाबासाहेब का क्या योगदान था?
आरबीआई की स्थापना हिल्टन यंग कमीशन की सिफारिशों के आधार पर की गई थी। इस कमीशन ने अपने दिशानिर्देश डॉ. अंबेडकर की प्रसिद्ध पुस्तक “The Problem of the Rupee: Its Origin and its Solution” से लिए थे। इस प्रकार, वैचारिक रूप से वह आरबीआई के मार्गदर्शक थे।
पूना पैक्ट (Poona Pact) किनके बीच हुआ था और क्यों?
पूना पैक्ट 24 सितंबर 1932 को डॉ. अंबेडकर और महात्मा गांधी के समर्थकों के बीच हुआ था। अंग्रेजों ने दलितों को अलग निर्वाचक मंडल दे दिया था, जिसका गांधीजी ने आमरण अनशन कर विरोध किया। गांधीजी की जान बचाने और समाज को बंटने से रोकने के लिए यह समझौता हुआ, जिसमें अलग निर्वाचक मंडल के बजाय दलितों के लिए आरक्षित सीटें बढ़ा दी गईं।
संविधान में हिंदू कोड बिल क्या था और डॉ. अंबेडकर ने इस्तीफा क्यों दिया?
हिंदू कोड बिल भारतीय महिलाओं को तलाक और संपत्ति के समान अधिकार देने के लिए लाया गया था। जब संसद में रूढ़िवादी सदस्यों के भारी विरोध के कारण यह बिल पास नहीं हो सका, तो डॉ. अंबेडकर ने महिलाओं के अधिकारों से समझौता न करते हुए अपने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया था।
उन्होंने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध धर्म क्यों स्वीकार किया?
डॉ. अंबेडकर हिंदू धर्म में व्याप्त जाति व्यवस्था और छुआछूत की कुरीतियों से बेहद निराश थे। उन्हें एक ऐसे धर्म की तलाश थी जो जन्म के आधार पर भेदभाव न करे और स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व सिखाए। इसीलिए 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया।