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रौलट एक्ट का सम्पूर्ण  विश्लेषण

Rowlatt Act

रौलट एक्ट का इतिहास और प्रभाव: एक काला कानून जिसने भारत को हिला दिया

 दोस्तों, इतिहास की किताबें अक्सर तारीखों और संधियों के बोझ तले दब जाती हैं,लेकिन कुछ घटनाए ऐसी होती हैं जो सीधे दिल और रूह पर वार करती हैं | क्या आपने कभी सोचा है कि एक अकेला कानून पूरे देश को कैसे हिला सकता है? कैसे चंद पन्नों पर लिखी इबारत लाखों लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर कर सकती है? आज हम बात करने जा रहे हैं भारतीय इतिहास के उसी काले पन्नों की, जिसे दुनिया रौलट एक्ट (Rowlatt Act) के नाम से जानती है|

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जरा सोचीय, आप अपने घर में शांति से बैठे हैं, अचानक पुलिस आती है आपको बिना कोई कारण बताए, बिना कोई वारंट दिखाए गिरफ्तार कर लेती है | आप चिल्लाते हैं की मेरा गुनाह क्या है ? मुझे वकील चाहिए ! मुझे जज के सामने पेश करो! लेकिन जवाब मिलता है, “चुप रहो ! तुम्हारे पास कोई अधिकार नहीं है।” सुनकर ही रोंगटे खड़े हो गए ना ? यह कोई डरावनी फिल्म की कहानी नहीं है, बल्कि 1919 के भारत की एक खौफनाक सच्चाई थी | यही वह कड़वा सच था जिसने हमारे स्वतंत्रता संग्राम मे पेट्रोल छिड़कने का काम किया| आइए, इस पूरे घटनाक्रम को बिल्कुल आसान और अपनी बोलचाल की भाषा में समझते हैं | हम गहराई में गोता लगाएंगे और देखेंगे कि कैसे एक ‘काले कानून’ ने अंग्रेजी हुकूमत की कब्र खोदने की शुरुआत कर दी |

रौलट एक्ट आखिर था क्या? आसान शब्दों में समझे 

अगर तकनीकी भाषा की बात करें, तो इस एक्ट का असली नाम था ‘द अनार्कीकल एंड रेवोल्यूशनरी क्राइम्स एक्ट 1919′ (The Anarchical and Revolutionary Crimes Act of 1919) | लेकिन यह नाम इतना लंबा और पेचीदा था कि लोगों ने इसे बनाने वाले के नाम पर ‘रौलट एक्ट’ कहना शुरू कर दिया |

इसे आप ऐसे समझ सकते हैं कि यह ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाया गया एक ऐसा हथियार था, जिसका मकसद भारतीयों की उठती हुई आवाज़ को हमेशा के लिए कुचल देना था | अंग्रेजों को डर लगने लगा था कि भारतीय अब आजादी के लिए बहुत ज्यादा मुखर हो रहे हैं | उन्हे लगा की अगर अभी सख्ती नहीं की गई, तो उनके हाथ से भारत निकल जाएगा | इसलिए उन्होंने न्याय और कानून की धज्जिया उड़ाते हुए एक ऐसा ड्राफ्ट तैयार किया जो पूरी तरह से तानाशाही पर आधारित था |

प्रथम विश्व युद्ध और अंग्रेजों की चाल

 इस एक्ट के बैकग्राउंड को समझने के लिए हमें प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) के दिनों में जाना होगा | जब विश्व युद्ध चल रहा था, तब अंग्रेजों ने भारतीयों से कहा था कि “भाइयों, इस मुश्किल वक्त में हमारा साथ दो, सेना मे भर्ती हो जाओ, पैसे से मदद करो | जब युद्ध खत्म होगा, तो हम खुश होकर भारत को बहुत सारे राजनीतिक अधिकार देंगे और शासन में आपकी हिस्सेदारी बढ़ाएंगे|”

भोले-भाले भारतीयों ने उनकी बातों पर भरोसा कर लिया | लाखों भारतीय सैनिक अंग्रेजों की तरफ से लड़ने गए | लेकिन 1918 मे जब युद्ध खत्म हुआ  तो अंग्रेजों ने अपना रंग बदल लिया | अधिकारों और स्वशासन की जगह, उन्होंने भारतीयों को क्या दिया ? एक क्रूर और दमनकारी कानून ! यह तो वही बात हो गई कि आपने किसी की जान बचाई और बदले में उसने आपको ही जेल में डाल दिया | यह भारतीयों के साथ बहुत बड़ा धोखा था |

Rowlatt Act

सर सिडनी रौलट और उनकी समिति

 अब सवाल उठता है की यह ‘रौलट’ शब्द आया कहाँ से? दरअसल, 1917 में ब्रिटिश सरकार ने भारत में बढ़ रही ‘क्रांतिकारी गतिविधियों’ (जिन्हे वे आतंकवाद कहते थे ) की जांच के लिए एक समिति बनाई| इस सेडिशन कमेटी (Sedition Committee) के अध्यक्ष थे एक ब्रिटिश जज-सर सिडनी रौलट (Sir Sidney Rowlatt) |

इस रौलट साहब ने कुछ महीनों तक भारत मे घूम-घूम कर जांच की और सरकार को रिपोर्ट दी कि “हुज़ूर, भारत में तो बगावत की आग सुलग रही है | अगर इन्हे अभी रोका नही रोका गया तो बहुत बड़ा बवाल हो जाएगा |” इसी समिति की सिफारिशों के आधार पर इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल ने 18 मार्च 1919 को दिल्ली में भारी विरोध के बावजूद इस बिल को पास कर दिया | मजे की बात यह है कि काउंसिल के सभी भारतीय सदस्यों (जिनमें मोहम्मद अली जिन्ना, मदन मोहन मालवीय आदि शामिल थे) ने इसके खिलाफ वोट किया था, लेकिन अंग्रेजों ने अपने बहुमत के अहंकार में इसे थोप दिया|

इस काले कानून के मुख्य प्रावधान क्या थे ?

गांधीजी ने इसे ‘काला कानून’ कहा था, और यह बिल्कुल सही नाम था आइए देखते हैं की इस एक्ट के अंदर आखिर ऐसा क्या लिखा था जिसने पूरे देश का खून खोला दिया था:

बिना वारंट के गिरफ़्तारी का अधिकार

 सबसे खतरनाक नियम! पुलिस को सिर्फ ‘शक’ के आधार पर किसी भी भारतीय को गिरफ्तार करने की खुली छूट दे दी गई | कोई सबूत नहीं, कोई वारंट नहीं | अगर किसी पुलिस वाले को लगता है कि आप सरकार के खिलाफ कुछ कर रहे हैं, तो वह आपको उठाकर जेल में डाल सकता था | यह मूल मानवधिकारों का सीधा कत्ल था |

प्रेस पर सख्त पाबंदी 

अंग्रेज जानते थे की अखबार और पत्रिकाएं लोगों को जागरूक कर रही हैं | इसलिए इस एक्ट के तहत प्रेस की स्वतंत्रता को पूरी तरह से छीन लिया गया | आप सरकार के खिलाफ एक शब्द भी नहीं छाप सकते थे | अगर कोई भी अखबार राष्ट्रवादी विचार छापता था, तो उसकी मशीने जब्त कर ली जाती थीं और संपादकों को जेल भेज दिया जाता था| यह कलम की ताकत से डरे हुए साम्राज्य की निशानी थी |

मुकदमे के बिना जेल(नो दलील, नो वकील, नो अपील )

यह एस एक्ट को सबसे कुख्यात हिस्सा था | अगर आपको गिरफ्तार कर लिया गया, तो आप 2 साल तक जेल मे बिना किसी मुकदमे के सड़ाए जा सकते थे | भारत के आम लोगों ने इस कानून का सार निकालने के लिए एक बहुत ही सटीक और लोकप्रिय नारा गढ़ा: “नो दलील, नो वकील, नो अपील”|

  • नो दलील:आप कोर्ट मे अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए कोई बहस (दलील) नहीं कर सकते|
  • नो वकील: आपको अपनी रक्षा के लिए कोई कानूनी सलाहकार या वकील रखने का अधिकार नहीं होगा |
  • नो अपील: और तो और, जिस विशेष अदालत में आपको सुनाई जाएगी, उसके खिलाफ आप किसी उच्च न्यायालय में अपील भी नहीं कर सकते | फैसल पत्थर की लकीर!

क्या यह न्याय व्यवस्था थी ? नहीं, यह शुद्ध रूप से आतंक था जिसे कानूनी जामा पहना दिया गया था |

भारत में रौलट एक्ट का जोरदार विरोध क्यों हुआ?

जैसा कि मैंने पहले बताया, भारतीय प्रथम विश्व युद्ध के बाद इनाम की उम्मीद कर रहे थे, लेकिन उन्हे मिला यह चाबुक| यह एक स्वाभिमानी राष्ट्र के गाल पर पड़ा करारा तमाचा था | जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया | हर वर्ग-किसान, छात्र, व्यापारी, बुद्धिजीवी सभी ने महसूस किया कि यह कानून उनकी आजादी का जनाज़ा निकालने के लिए है |

गांधीजी की एंट्री: रौलट सतयग्रह का जन्म

इसी समय भारतीय राजनीति के क्षितिज पर एक ऐसे सितारे का उदय हो रहा था जिसने आगे चलकर पूरा इतिहास बदल दिया- महात्मा गांधी| गांधीजी हाल ही में दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे और उन्होंने रौलट एक्ट के बारे में सुना, तो उन्हे गहरा सदमा लगा | उन्होंने कहा कि यह कानून “अनुचित, स्वतंत्रता-विरोधी और व्यक्ति के मूल अधिकारों को नष्ट करने वाला” है |

गांधीजी ने तय किया कि अब केवल याचिकाएं देने और प्रार्थना करने से काम नहीं चलेगा| उन्होंने देशवायपी ‘रौलट सतयग्रह’ आह्वान किया | यह भारत के इतिहास में पहला ऐसा आंदोलन था जो वास्तव में ‘अखिल भारतीय’ (All India) स्तर पर हो रहा था |

Rowlatt Act

हड़ताल, उपवास और राष्ट्रव्यापी आंदोलन 

गांधीजी ने देश की जनता से 6 अप्रैल 1919 के दिन को राष्ट्रीय अपमान दिवस’ के रूप में मनाने की अपील की | उन्होंने लोगों से कहा कि वे इस दिन उपवास रखें, प्रार्थना करें और शांतिपूर्ण हड़ताल (hartal) करे |

प्रतिक्रिया अभूतपूर्व थी! मानों पूरा देश एक झटके में नींद से जाग गया हो बंबई कलकत्ता, मद्रास , लाहौर- हर बड़े शहर में दुकानें बंद हो गई| रेलवे वर्कशॉपस में काम ठप हो गया| लोग सड़कों पर उतर आए, रैलियां निकली गईं और विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई | हिन्दू और मुसलमान एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर वंदे मातरम और अल्लाह-हू-अकबर के नारे लगाते हुए सड़कों पर मार्च कर रहे थे | अंग्रेजों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि भारत की जनता इतनी बड़ी संख्या मे एकजुट हो सकती है | सरकार बौखला गई और उसने दमन का क्रूर चक्र शुरू कर दिया |

पंजाब में उबाल और जालियावाला बाग हत्याकांड 

पूरे देश में विरोध हो रहा था, लेकिन सबसे ज्यादा उबाल पंजाब में था। क्यों ? क्योंकि पंजाब ने विश्व युद्ध में सबसे ज्यादा सैनिक दिए थे | वहां के लोग पहले ही युद्ध जनित महंगाई भुखमरी और जबरन सैनिक भर्ती से बुरी तरह त्रस्त थे | ऊपर से इस रौलट एक्ट ने आग में घी का काम किया | लाहौर और अमृतसर विरोध के सबसे बड़े केंद्र बन गए |

डॉ सैफुद्दीन किचलू और सत्यपाल की गिरफ़्तारी 

अमृतसर मे दो बहुत ही लोकप्रिय और सम्मानित स्थानीय नेता थे – डॉ सैफुद्दीन किचलू  अरु डॉ सत्यपाल | वे शांतिपूर्ण तरीके से हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रचार कर रहे थे अरु रौलट एक्ट का विरोध कर रहे थे | 10 अप्रैल 1919 को ब्रिटिश प्रशासन ने घबराहट में इन दोनों नेताओं को धोखे से बुलाया और बिना कारण बताए गिरफ्तार करके किसी अज्ञात स्थान पर भेज दिया |

जैसे ही यह खबर अमृतसर में फैली, लोग भड़क गए | भीड़ ने अपने नेताओं की रिहाई की मांग करते हुए डिप्टी कमिश्नर के घर की ओर मार्च किया | पुलिस ने निहत्थी भीड़ पर गोलियां चला दीं | इसके बाद भीड़ बेकाबू हो गई और उसने कुछ सरकारी इमारतों और बैंकों में आग लगा दी, जिसमे कुछ अंग्रेज अधिकारियों को भी मौत हो गई | हालत को ‘काबू’ करने के लिए शहर का प्रशासन एक क्रूर सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल रेजिनाल्ड डायर (General Dyer) को सौंप दिया गया।

13 अप्रैल 1919: वह खूनी बैसाखी का दिन

 और फिर आया वह दिन जिसने मानवता को हमेशा के लिए शर्मसार कर दिया | 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी का पवित्र त्योहार था | अमृतसर के जलियावाला बाग में हजारों लोग- जिनमे औरतें,बूढ़े और छोटे-छोटे बच्चे भी शामिल थे- इकट्ठा हुए थे, तो बहुत से लोग तो सिर्फ बैसाखी का मेला देखने गांवो से आए थे जिन्हे शहर में लगे ‘मार्शल लॉ’ के बारे में कुछ पता ही नहीं था |

सैनिकों ने 10 मिनट तक लगातार गोलियां बरसाई| कुल 1650 राउंड फायर किए गए | लोग जान बचाने के लिए दीवारों पर चढ़ने लगे, लेकिन उन्हे वहीं भून दिया गया | कई लोग जान बचाने के लिए बीच मे बने कुएं में कूद गए, लेकिन कुआ भी लाशों से पट गया | सरकारी आंकड़ों ने कहा कि 379 लोग मारे गए, लेकिन असलियत में 1000 से ज्यादा निर्दोष भारतीय उस दिन शहीद हुए थे | जलियावाला बाग की मिट्टी उस दिन लाल हो गई थी | यह रौलट एक्ट का ही वो भयानक परिणाम था जिसने भारत की आत्मा को गहरे घाव दे दिए |

Rowlatt Act

रौलट एक्ट के दूरगामी परिणाम

जालियावाला बाग नरसंहार की खबर जब पूरे देश में फैली, तो एक पल के लिए सन्नाटा छा गया | लेकिन यह सन्नाटा डर का नहीं बल्कि आने वाले उस भयंकर तूफान से पहले की शांति थी जो ब्रिटिश साम्राज्य को उखाड़ फेंकने वाला था | नोबेल पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अंग्रेजों द्वारा दी गई ‘नाइटहुड’ (Knighthood) की उपाधि विरोध स्वरूप वापस लौटा दी | गांधीजी ने हिंसा बढ़ते देख अपना सत्याग्रह तो वापस ले लिया, लेकिन उन्होंने समझ लिया था कि अब इस ‘शैतानी सरकार’ के साथ कोई सहयोग नहीं किया जा सकता |

असहयोग आंदोलन की नींव 

रौलट एक्ट और उसके बाद हुए जलियावाला बाग हत्याकांड ने भारतीय राजनीति की दिशा हमेशा के लिए बदल दी | अब तक जो काँग्रेस केवल सुधारों की मांग कर रही थी, वह अब जा-आंदोलन के रास्ते पर आ गई | लोगों का ब्रिटिश न्याय प्रणाली से पूरी भरोसा उठ गया | यही वह बिन्दु था जहां से गांधीजी के विशाल असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement-1920) की नींव पड़ी | भारतीयों ने ठान लिया की अब विदेशी कपड़ों से लेकर विदेशी अदलतों तक, हर चीज का बहिष्कार किया जाएगा |

हिन्दू-मुस्लिम एकता का उदय 

अंग्रेजों की ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति को भी इस एक्ट के विरोध ने तगड़ा झटका दिया | रौलट सत्याग्रह के दौरान भारत ने अभूतपूर्व हिन्दू-मुस्लिम एकता देखी | खिलाफ आंदोलन और असहयोग का आपस मे जुड़ना इसी एकता का परिणाम था, जिसकी पृष्ठभूमि रौलट एक्ट के विरोध ने तैयार की थी |

निष्कर्ष: एक कानूनी जिसने अंग्रेजी जिसने अंग्रेजी हुकूमत की जड़े खोद दीं 

तो दोस्तों, रौलट एक्ट केवल एक पन्ने पर छापा कानून नहीं था; यह ब्रिटिश साम्राज्यवाद के अहंकार और क्रूरता का जीत-जागता प्रमाण था | अंग्रेजों ने सोच था की इस दमनकारी कानून से वे भारतीयों में खौफ पैदा कर देंगे और उन्हे हमेशा के लिए अपना गुलाम बनाए रखेंगे | लेकिन हुआ इसका बिल्कुल उल्टा !

जैसे स्प्रिंग को जितना दबाओ, वह उतनी ही तेजी से उछलती है, वैसे ही रौलट एक्ट ने भारतीय राष्ट्रवाद की स्प्रिंग को इतनी तेजी से उछाला कि अंततः 1947 में अंग्रेजों को अपना बोरिया-बिस्तर बांधकर यहाँ से भागना ही पड़ा। इस एक्ट ने महात्मा गांधी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया और भारत के स्वतंत्रता संग्राम को ड्राइंग रूम की राजनीति से निकालकर आम आदमी के हाथों में सौंप दिया। जलियांवाला बाग के शहीदों का खून व्यर्थ नहीं गया। रौलट एक्ट वास्तव में वह हथौड़ा साबित हुआ, जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की ताबूत में आखिरी कील ठोकने की शुरुआत की।

इतिहास हमें सिखाता है कि जब भी सत्ता अंधी होकर न्याय और अधिकारों को कुचलने की कोशिश करती है, तो जनता की अदालत उसे अंततः उखाड़ ही फेंकती है। रौलट एक्ट और उसके खिलाफ उठी जनक्रांति आज भी हमें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहने की प्रेरणा देती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

यह प्रसिद्ध नारा ‘रौलट एक्ट 1919’ से जुड़ा है। यह नारा इस बात को दर्शाता है कि इस कानून के तहत गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को न तो अदालत में बहस (दलील) करने की छूट थी, न वकील रखने का अधिकार था, और न ही फैसले के खिलाफ उच्च अदालत में अपील करने की अनुमति थी।

ये दोनों घटनाएं आपस में गहराई से जुड़ी हैं। पंजाब में रौलट एक्ट का कड़ा विरोध हो रहा था। इसी विरोध के चलते दो लोकप्रिय नेताओं (डॉ. किचलू और डॉ. सत्यपाल) को गिरफ्तार कर लिया गया था। इन्हीं नेताओं की शांतिपूर्ण रिहाई की मांग और बैसाखी मनाने के लिए लोग 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए थे, जहां जनरल डायर ने उन पर गोलियां चलवा दीं।

रौलट एक्ट मार्च 1919 में इम्पीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल द्वारा पारित किया गया था। उस समय भारत के वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड (Lord Chelmsford) थे।

महात्मा गांधी ने देखा कि यह कानून भारतीयों के मौलिक मानवाधिकारों का हनन कर रहा है। सरकार से बार-बार गुजारिश करने के बावजूद जब कानून पास कर दिया गया, तो गांधीजी ने इसे अनुचित मानते हुए पूरे देश में शांतिपूर्ण हड़ताल, उपवास और असहयोग के माध्यम से इसके विरोध का आह्वान किया, जिसे रौलट सत्याग्रह नाम दिया गया।

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